देखिए, मुझे नहीं मालूम कि आप सुशांत से कितना प्यार करते हैं। खैर, मैं भी करता हूं। आपमें और मुझमें या तो एक समानता हो सकती है या फिर एक फर्क कि मैं सुशांत से प्रेम करने वालों में से होने के अलावा एक पत्रकार भी हूं। इस तरह से अगर मैं अपनी पत्रकारिता धर्म को निभाते हुए कहूं तो दिल बेचारा एक प्यारी मूवी जरूर है पर दिल पर पत्थर रखकर कहना पड़ रहा है कि द फॉल्ट इन आवर स्टार्स जब आप देख लीजिएगा तो शायद आपको इन दोनों फिल्मों के बीच का अंतर समझ में आ जाएगा। अब चूंकि हम इस वक्त फिल्म की समीक्षा कर रहे हैं तो इसलिए इन सारी बातों का जिक्र करना जरूरी हो ही जाता है। आज सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम फिल्म दिल बेचारा का वर्ल्ड प्रीमियर था, शाम साढ़े 7 बजे से। फिल्म में उनके अपोजिट थीं संजना संघी जिनकी बतौर ‘लीड फीमेल एक्टर’ पहली फिल्म थी। आइये फिर बात कर लेते हैं मूवी के कमजोर और मजबूत पक्ष के बारे में,

पहले मजबूत पक्ष के बारे में बात करते हैं:

फिल्म दिल बेचारा की सबसे अच्छी बात यह है कि शुरू से लेकर अंत तक मूवी आपको बोर नहीं करेगी, यानि कि आपके चेहरे पर एक मुस्कान हमेशा बनी रहेगी। दूसरी अच्छी बात है कि इस फिल्म में सबकी एक्टिंग अच्छी है, खास कर क्लाइमेक्स में सुशांत कमाल की एक्टिंग करते हैं। सुशांत के अलावा संजना संघी और उनके दोस्त का किरदार निभा रहें कलाकार साहिल वैद ने भी अच्छी भूमिका निभाई है और खास कर वो जब भी फ्रेम में आएंगे आपको हँसा कर जाएंगे। इसके अलावा फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है, खास कर पेरिस वाले सीन्स खूबसूरत हैं। इन सबसे अच्छी चीज है, फिल्म के म्यूजिक और गाने बहुत ही प्यारे हैं। एक तरह से आप कह सकते हैं कि फिल्म की जान हैं। डायरेक्शन ठीक-ठाक है

SOURCE: GOOGLE

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फिल्म के कमजोर पक्ष भी जान लीजिए:

फिल्म की एडिटिंग इसका सबसे कमजोर पक्ष है। सबकुछ एकदम से जल्दी-जल्दी होता है। ऐसा या तो इसे एक्साइटिंग बनाने के चक्कर में हुआ है या फिर वाकई में एडिटिंग इनसे हो ही नहीं पाई है, मालूम नहीं..  पर इस फिल्म को कमजोर बनाने का सबसे बड़ा योगदान इनकी एडिटर दीपा भाटिया को जाता है। हालांकि इन्होंने ही काई पो चे की भी एडिटिंग की थी, खैर! इसके अलावा अब शायद मैं हर एक जगह पर तुलनात्मक अध्ययन कर रहा था तो चाहे उस वजह से हो या फिर जिस भी वजह से पर, जिस नॉवेल पर यह फिल्म बनी है, यानि द फॉल्ट इन आवर स्टार्स.. उसके ऑफिशियल रिमेक से अगर इस फिल्म की तुलना करें तो मात्र एक सीन को छोड़ कर कोई भी सीन उसकी तुलना में बेहतर नहीं हो पाया है। एक लास्ट सीन जिसमें सुशांत अपने लिए प्रेयर करवाते हैं, उस वक्त जो पूरा प्रेयर मीट होता है, वो सीन काफी बेहतरीन के साथ-साथ मार्मिक भी है। जहां डायलॉग है कि उस दुनिया को देख कर हम क्या ही करेंगे जिसमें मेरा दोस्त इमेन्यूअल नहीं होगा। यह डायलॉग सुशांत का दोस्त उसके लिए बोलता है। इसके अलावा जैसा कि मैंने बताया डायरेक्शन ठीक-ठाक है। दरअसल हुआ ये है कि मुकेश छाबरा ने कास्टिंग बहुत सही की है, उनसे एक्टिंग भी सही करवाई है पर डायरेक्शन कमजोर लग रहा है। मानो हर एक फ्रेम में ऐसा महसूस होता कि ये थोड़ा और बेटर हो सकता था। 

इसके अलावा भी कई छोटे मोटे एलिमेंट्स थे जैसे कि अगर आपको जमशेदपूर जैसे छोटे शहर को ही दिखाना है तो थोड़ी इसकी खूबसूरती से लोगों को रूबरू करा सकते थे पर वो नहीं हो सका। इसके अलावा जमेशदपुर से पेरिस जाने के प्रोसेस के वक्त एडिटिंग बहुत ही हड़बड़ाहट वाली मालूम पड़ती है। बाकि फिलहाल इससे ज्यादा मैं नहीं बोल पाऊंगा। साथ ही इस फिल्म को मैं किसी तरह की रेटिंग नहीं दूंगा, आप फिल्म देख सकते हैं, बोर नहीं होंगे।