kavita

भँवर में नूर के करवट से जैसे नाव चले, कि जैसे सीना-ए-शाइर में कोई ख़्वाब पले

गोरखपुर में पैदा होने वाले फिराक़ का असली नाम रघुपति सहाय फिराक था. ये शायर और आलोचक

2019-03-02T17:36:14+05:30March 3rd, 2019|आज की कविता|0 Comments

युद्ध के विशाल जबड़ों में समां जाती हैं संस्कृतियाँ – सभ्यताए -एवं मानवता

युद्ध के विशाल जबड़ों में समां जाती हैं संस्कृतियाँ - सभ्यताए -एवं मानवता -- परस्पर द्वेषों के

2019-02-28T10:11:25+05:30February 28th, 2019|आज की कविता|0 Comments

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं- धूमिल

सबसे अधिक हत्याएँ समन्वयवादियों ने की। दार्शनिकों ने सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा। भीड़ ने कल बहुत पीटा

2019-02-25T17:27:05+05:30February 26th, 2019|आज की कविता|0 Comments

ये किसकी इच्छा के अश्रु हैं जो इस गोरी देह पर निर्लज्जता से जमे हुए काले पड़ रहे हैं

बाबुषा कोहली की कविताएं नई सोच को जन्म देती है. बहुत कम वक्त में बाबुषा ने कविता

2019-02-25T19:45:15+05:30February 24th, 2019|आज की कविता|0 Comments

दिल हाथ से निकलता है जिस बुत की चाल से मौंजें लहू में उठती हैं जिसके ख़्याल से

आज उर्दू के शायर जोश मलिहाबादी के जन्मदिन पर हम अपने पाठको के लिए लाए हैं उनकी

2019-02-21T17:31:30+05:30February 22nd, 2019|आज की कविता|0 Comments