जापानी बुखार यानी इन्सेफ़लाइटिस से असम में अब तक 60 से भी ज़्यादा जाने जा चुकी हैं। असम में इस समय जापानी बुखार से जूझ रहा है। इस समय हालत इतने खराब हैं कि पूरे राज्य ने हाई अलर्ट जारी किया हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक असम में 56 से ज़्यादा लोगों की जाने जा चुकी हैं। पिछले तीन महीनों में जापानी बुख़ार के 216 मामले देखें गए। इस समस्या के चलते असम सरकार ने सितंबर अंत तक स्वास्थ्य विभाग के सभी कर्मचारियों की छुट्टी कैंसल कर दी है। à¤ªà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• तस्वीर

क्या है इन्सेफ़लाइटिस?

इन्सेफ़लाइटिस एक जापानी बुखार है। यह बीमारी दिमाग से जुड़ी हुई बीमारी है जो संक्रमण यानी वायरल से फैलती है। ये बीमारी किसी भी मच्छर, सूअर और गंदगी से फैलने वाली बीमारी है जो सबसे पहले इंसान के शरीर में घुसती है उसके बाद सीधा दिमाग पर अटैक करती है। दिमाग में इस वायरस के चले जाने से इंसान के सोचने-समझने की क्षमता खत्म होने लगती है जिसकी वजह से बच्चे इसका शिकार ज़्यादा हो रहे हैं। इस मामले में ज़्यादातर 1 से 14 साल के बच्चे और 65 साल से ऊपर के लोग इसकी चपेट में आते हैं। यह बीमारी साल के तीन महीने अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में सबसे ज़्यादा बवाल मचाती हैं।प्रमुख कारण

क्या है इस बीमारी के लक्षण?

इस बीमारी के लक्षण कई तरह के देखे गए हैं। इस बीमारी में कम-से-कम 50 से 60 प्रतिशत लोगों की जान चली जाती हैं। इसमे ज़्यादातर  बुखार, सिरदर्द, गरदन में अकड़, कमजोरी और उल्टी, होने जैसे लक्षण देखे गए हैं। इस बुखार में सिरदर्द बढ़ता ही चला जाता है और हर टाइम सुस्ती छाई रहती है। जैसे- भूख कम लगना, तेज बुखार होना, कुछ समय के लिए भ्रम हो जाना, उसके बाद फिर पागलपन के दौरे आना और लकवा मारना। इस बिमारी में मरीज कोमा तक भी पहुंच जाता है।  इस बीमारी को सबसे ज़्यादा बच्चों में देखा गया है इसलिए बहुत छोटे बच्चों का ज्यादा देर तक रोना, भूख की कमी, बुखार और उल्टी होने जैसे लक्षण दिखने लगते हैं।जापानी बुखार

असम में सरकार क्या कर रही है?

राज्य के हेल्थ डिपार्टमेन्ट ने 30 सितंबर तक के लिए डॉक्टरों, नर्सों और हेल्थ सेक्टर के दूसरे कर्मचारियों की सारी छुट्टियां कैंसल करने का नोटिस दिया है। इस मामले पर  स्वास्थ्य मंत्री ‘हेमंत बिस्व शर्मा’ का कहना है कि, ‘इमर्जेंसी केस में केवल डिप्टी कमिश्नर को छुट्टी की इजाज़त मिलेगी। कोई भी डॉक्टर, नर्स या दूसरे स्वास्थ्य कर्मी अपनी पोस्टिंग की जगह से कहीं भी नहीं जाएंगे। अगर कोई कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं होगा तो, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।’

सभी डिप्टी कमिश्नरों को हाई-अलर्ट जारी कर दिया है। सभी कमिश्नरों को पंचायत और शहर की जगहों के साथ जेई(इन्सेफ़लाइटिस ) के मामलों में सहयोग करने के लिए ऑर्डर दिये हैं।  हेमंत बिस्व शर्मा का कहना है कि, ‘जेई’ बीमारी से असम ‘संक्रमण काल’ से गुज़र रहा है। जुलाई से अब तक ‘जेई’ के 190 मामले सामने आए हैं। इनमें से 49 मरीजों की जान जा चुकी है।’

उन्होंने यह भी कहा कि, इस समय जो मौसम है उसकी वजह से इस बीमारी के फैलने के हालात उत्पन्न हों जाते हैं क्योंकि, इस वक्त यहां भारी बारिश होती है। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि, धान की बड़े पैमाने पर खेती होती है इसी के साथ पूरे राज्य में सुअर पालन की वजह से वायरस के बढ़ने के हालात पैदा हो जाते हैं। मंत्री जी ने बताया कि, इस समस्या से छुटकारा मिल सके इसलिए एक रूटीन टीकाकरण का अभियान चलाया गया था जिसे साल 2016-17 में 20 जिलों में किया गया था।

इस पूरे मामले पर डॉक्टर्स का कहना हैं

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, जापानी इंसेफेलाइटिस संक्रमित रोगियों का इलाज कर रही डॉ. रिमामोनी दौले कहती है कि, “जापानी इंसेफेलाइटिस के ज़्यादातर मामलों में मरीज़ के बचने की उम्मीद महज 30 प्रतिशत ही होती है। जबकि 30 प्रतिशत लोग थोड़े या कभी-कभी पूरे विकलांग होने के साथ-साथ मानसिक रोग के भी शिकार हो जाते हैं। हालांकि 30 प्रतिशत लोगों के पूरी तरह से ठीक होने की संभावना भी रहती है।”

डॉक्टर्स का कहना है कि इस बुखार की कोई ऐसी दवाई है ही नहीं जिससे ये बीमारी जल्दी ठीक हो सके। इंसेफेलाइटिस में ज्यादातर शिकार हुये बच्चे और बूढ़े लोग होते हैं। इसे फिलहाल के लिए टीकाकरण और मच्छरों को मारने से लेकर कई तरह की सावधानी रखने से रोका जा सकता है।

एक रिपोर्ट के हिसाब से, जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में ‘जेई’ और ‘एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम’ (एईएस) के सबसे ज़्यादा आंकड़े देखने को मिले हैं। अगर इन तीन महीनों में कोई भी ‘जेई’ का इंजेक्शन लगा भी ले तो, उससे कोई फायदा नहीं हो पाता क्योंकि, इंजेक्शन लगाने के बाद भी इंसान के अंदर इस रोग से लड़ने की  ‘रोग प्रतिरोधक क्षमता’ उस हद तक मजबूत नहीं हो पाता जिससे कि इस रोग से लड़ा जा सके।इसके लिए जरुरी है कि यह इंजेक्शन्स जनवरी, फरवरी और मार्च में लगाया जाए ताकि शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित होने का समय मिल सके और इंसान को इसका उचित लाभ मिले।

इस बीमारी को ठीक करने में लगी असम के हॉस्पिटल की डॉक्टर रिमामोनी दौले ने बताया कि इस बीमारी से बचने के लिए पालतू सुअरों को घर से दूर रखना बहुत ज़रूरी है इसी के साथ ही पशुपालन विभाग को पालतू सुअरों के ‘इंसेफेलाइटिस’ का इंजेक्शन लगाने की भी ज़रूरत है। तभी हालत सुधार सकते हैं और फ्यूचर में भी इससे बच सकते हैं।

असम में फैल रही ‘जेई’ की बीमारी को देखते हुये असम के स्वास्थ्य मंत्री ‘हेमंत बिस्वा’ ने हॉस्पिटल में जाने वाले हर मरीजों को 1,000 रुपये देने की घोषणा की है। इसके साथ ही आईसीयू में रहने वाले मरीजों जो ‘जेई’ और ‘एईएस’ का पूरा ख़र्चा सरकार ने देने का निर्णय लिया है। अगर ‘जेई’ और ‘एईएस’ ,से ग्रसीत कोई मरीज प्राइवेट हॉस्पिटल्स और नर्सिंग होम में इलाज करवाने जाते हैं तो, उन्हें सरकार 100,000 रुपये देने का ऐलान किया है।

सरकार द्वारा उठाया यह कदम बहुत ही प्रशंसनीय है। इस महामारी के समय राज्य जिस तरह से अपनी कोशिशों में लगा हुआ है उससे बहुत जल्द ही असम इस समस्या से मुक्त हो सकता है। लेकिन इस बीमारी की वजह से कई घरों की हँसती-खेलती नन्ही जाने जा चुकी हैं और ये आंकड़ा रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इस वजह से हर कोई सदमे में हैं।आप ये जानते ही होंगे कि, इससे पहले बिहार के मुज्जफ्फरपुर में भी चमकी बुखार की महामारी फैली थी लेकिन चमकी बुखार और जापानी बुखार में ज़मीन-आसमान का अंतर हैं।

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