जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि को छह माह के लिए और बढ़ा दिया गया है. सोमवार को गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने और जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक-2019 पर प्रस्ताव संसद में चर्चा के लिए पेश किया. जिसे ध्वनिमत से मंज़ूरी दे दी गई. हालांकि इस दौरान कांग्रेस की ओर से ज़ोरदार विरोध देखने को मिला. कांग्रेस का कहना था कि अगर राज्य में चुनी हुई सरकार होती तो हालात बेहतर होते. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने तो ये भी दावा किया कि राज्य में पहले रही पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार की गलत नीतियों का ही नतीजा है कि राष्ट्रपति शासन बढ़ाना पड़ रहा है.

अमित शाह और मबबूबा मुफ्ती, फोटो सोर्स: गूगल

अमित शाह और मबबूबा मुफ्ती, फोटो सोर्स: गूगल

जम्मू-कश्मीर में पिछले साल जून में राष्ट्रपति शासन लगा था. उस वक्त भाजपा ने ये कहते हुए पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़ लिया था कि जम्मू-कश्मीर में बढ़ते कट्टरपंथ और चरमपंथ के चलते सरकार में बने रहना मुश्किल हो गया है. भाजपा उस समय कश्मीर के हुर्रियत नेताओं पर ऑपरेशन ऑलआउट के तहत कार्रवाई करना चाहती थी. जबकि टीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती बातचीत के पक्ष में थी.

अमित शाह ने क्या कहा ?

शाह ने प्रस्ताव और विधेयक पेश करते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने साल के अंत में जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने का फैसला किया है. मंगलवार 2 जुलाई को राष्ट्रपति शासन की अवधि समाप्त हो रही है. ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ा दी जाए.

मनीष तिवारी, फोटो सोर्स: गूगल

मनीष तिवारी, फोटो सोर्स: गूगल

उन्होंने रमजान, अमरनाथ यात्रा, और कुछ समुदाय के सदस्यों का पहाड़ पर चले जाने का जिक्र करते हुए कहा कि वहां दशकों से अक्टूबर के पहले चुनाव नहीं कराए गए हैं. उन्होंने कहा कि सदस्य वहां की स्थिति समझेंगे और प्रस्ताव का समर्थन करेंगे. वहीं कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए शाह ने कहा कि हमारे पास सरकारों का अकाल नहीं है. अगर ऐसा होता तो हमें एक राज्य चलाने के लिए राष्ट्रपति शासन की जरूरत नहीं पड़ती.

इस पर प्रतिपक्ष का क्या कहना है?

वहीं विधेयक पर चर्चा के दौरान, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष, गुलाम नबी आजाद ने अपनी बात रखते हुए कहा कि, ‘नेहरू की वजह से कश्मीर भारत का हिस्सा है.’

गुलाम नबी आजाद, फोटो सोर्स: गूगल

गुलाम नबी आजाद, फोटो सोर्स: गूगल

नेहरू की संधि से पहले भी कश्मीर के कई इलाके पाकिस्तान से लिए गए थे. जिसकी चर्चा नहीं होती क्योंकि इससे वोट नहीं मिलता. दोनों विधेयकों को राज्यसभा में पास करा लिया गया है. लोकसभा में यह पहले ही पास हो चुका है.

कच्चा चिट्ठा के लिए यह स्टोरी सौरभ मिश्रा ने लिखी है.