साल 2016 में जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला नॉवेल ‘नाकोहस’ आया. नॉवेल को कुछ खास सराहा नहीं गया. लेकिन, लोगों की डिक्शनरी में इसने एक नया शब्द जरूर डाल दिया. ‘नाकोहस’ यानि नेशनल कमीशन ऑफ़ हर्ट सेंटीमेंट्स (National Commission of Hurt Sentiments). ऐसा कमीशन जहाँ ‘ऑफेंड’ हुए लोगों की सुनवाई हो, कार्यवाही हो.

वक़्त आ गया है जब सरकार प्रोफेसर अग्रवाल की सलाह माने और एक ‘नाकोहस’ बना दे, इससे पहले कि कोई अनहोनी हो जाए.

बीते शुक्रवार हैशटैग #BanNetflixIndia ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा. लोगों का कहना था कि Netflix ऐसा कॉन्टेंट बना रहा है जो हिन्दुओं की भावना आहत करता है. शिवसेना के आईटी सेल मेंबर गौरव सोलंकी ने Netflix India के खिलाफ FIR भी दर्ज करवा दी. फ्रीडम ऑफ़ स्पीच के पक्षधरों के बीच चर्चा शुरू हो गई है कि ये FIR नहीं, Pandora Box है. यानि, ऐसा जिन्न जो एक बार बाहर आ गया तो, वापिस बोतल के अंदर नहीं जाएगा।

धर्म खतरे में हैं:

धर्म को यदि युद्ध में फंसा कोई शहर मान लिया जाए तो, कला और साहित्य उसके लिए न्यूक्लियर बम है. यानि, सबसे बड़ा खतरा

धर्म रक्षक समूहों को कला और साहित्य से दिक्क्त आज से नहीं हुई, एक अरसे पहले से है. जब भी किसी फिल्म के पोस्टर फटने की खबर आती है या कोई किताब बैन होती है, उसके पीछे कोई न कोई ऐसा समूह होता है जिसे लगता है कि उसका धर्म खतरे में है. ये कोई आज का खेल नहीं है. एक धर्म ने फिल्म ‘Fire’ में दो लड़कियों के चुंबन से डर कर 1996 में पोस्टर फाड़े थे तो दूसरे धर्म ने 1988 में मजाक से डरकर ‘द सैटेनिक वर्सेस’ बैन करवा दी थी.

चूंकि Netflix कोई नया उदाहरण नहीं है. इसलिए धर्म-रक्षकों की इस मांग को तो सीरियस न ही लिया जाए. सीरियस न लेने का लॉजिक भी सीधा है. यदि इनकी मांग को सीरियस लिया जाना ही होता तो पहले सिनेमा बंद होता. फिर किताब प्रकाशन बंद होता. और फिर बारी आती इंटरनेट की.

नेटफ्लिक्स के कुछ किरदारों की तरह धर्म-रक्षकों को लगता है कि वो ही भगवान हैं
नेटफ्लिक्स के कुछ किरदारों की तरह धर्म-रक्षकों को लगता है कि वो ही भगवान हैं

कॉमेडियन वरुण ग्रोवर धर्म के रक्षकों का मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि उन्हें मौत की धमकियों से डर नहीं लगता. क्योंकि यदि इन धर्म रक्षकों को यदि किसी को मारना ही है तो पहले तो वो कुनाल कामरा (एक और कॉमेडियन जो धर्म पर वरुण से ज़्यादा तंज करता है) को मारेंगे न. यहां Netflix वरुण ग्रोवर है और बॉलीवुड/ किताब प्रकाशन कुनाल कामरा.

क्रिटिक के नज़रिए से:

मनोरंजन के इस नए माध्यम का आंकलन यदि किसी नज़रिए से किया जा सकता है, तो वो फिल्म समीक्षा, बुक रिव्यु आदि-आदि ही है.

एक सदी पहले समलैंगिकों का साहित्य में जब ज़िक्र हुआ तो, समाज के एक तबके ने उसे आग के हवाले करने की कोशिश की. जबकि, दूसरे तबके ने साहित्य के उस हिस्से को सेक्सुअलिटी की चर्चा में एक बढ़ता कदम मानकर सराहा.

एक सदी बाद जब समलैंगिकता पर अच्छे से रिसर्च हुई तो पता चला कि पिछली सदी का साहित्य असल में समलैंगिकता कम और डिज़ायर (वासना) ज़्यादा थी.

लिहाफ़
लिहाफ़ को एक ज़माने तक सेक्सुअलिटी पर लिखी कहानी माना जाता था, लेकिन अब यह डिज़ायर पर लिखा साहित्य हो गया है

लेकिन, बेहतर हुआ कि समलैंगिकता की सेक्सुअलिटी के नाम पर वासना रची गई. अगर पहले चरण में वो न हुआ होता तो दूसरे चरण में हम सेक्सुअलिटी और वासना में अंतर् ही ना ढूंढ पाते. और कौन कहता है कि दूसरा चरण ही आखिरी चरण है? बेहतर है कि इसे और फलने-फूलने दिया जाए.

इंटरनेट के अँगने में सरकार का क्या काम है?

एंटरटेनमेंट, इंटरनेट और सरकार के रिश्ते को समझने के लिए एक किस्सा याद करते हैं.

यह साल 1977 था. 21 महीनों की इमरजेंसी के बाद इंदिरा गाँधी को देश पर दया आई और देश में दोबारा चुनाव कराने की घोषणा कर दी. लेकिन, घोषणा आधे मन से की गई थी. दया अपनी जगह थी, कुर्सी अपनी जगह.

चुनाव से पहले लोग रैलियों में जुट गए थे. जिनमें से जेपी (जय प्रकाश नारायण) सबसे ऊपर थे. जनवरी 1977 में होने वाली ऐसी ही एक रैली को इंदिरा पूरा नहीं होने देना चाहती थीं.

रैली में लोग न जाएं, इसके लिए इंदिरा ने एक तरकीब निकाली. तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला को बुला कर उन्हें कहा गया कि रैली के दिन दूरदर्शन पर ‘बॉबी’ फिल्म चलाई जाए. ताकि लोग फिल्म देखने में व्यस्त रहें।

यदि यह मान कर चला जाए कि इंदिरा गाँधी को फिल्म के कलात्मक पहलु से कोई सरोकार नहीं था तो उनका यह कदम गलत था. अब सोचिये कि तत्कालीन सरकार के पास आपके इंटरनेट की चाबी हो. जब-जब आप गूगल पर ‘सदी की महानतम हस्तियां’ सर्च करें, गूगल आपको Prime Minister Office की वेबसाइट पर redirect कर दे.

Bobby
सरकार की तरफ से यह ‘booby trap’ नहीं, ‘Bobby’ trap था

जिन फिल्मों को सेंसर बोर्ड रिलीज़ करने से मना कर देता है, वो YouTube पर रिलीज़ की जाती हैं. जो खबरें 100 करोड़ के टर्नओवर वाले चैनल नहीं चलाते, वे किसी वेबसाइट के छोटे से ऑफिस से चलाई जाती हैं.

कुछ दिन पहले ही सरकार ने डिजिटल मीडिया में FDI पर ज़्यादा से ज़्यादा 26 प्रतिशत की कैप लगा दी है. यानि आपकी कंपनी में कम से कम 74 प्रतिशत पैसा भारत से ही हो. जबकि पॉलिटिकल पार्टीज़ की फंडिंग पे ऐसा कोई कानून नहीं है. इंटरनेट मीडिया से जुड़ा यह पहला कानून ऐसा कानून है. बेहतर हो यदि यह आखिरी भी हो.

Netflix को बैन करने की मांग करने वाले शायद यह भूल गए हैं कि सरकार बदलेगी तो इंटरनेट से जुड़े ये कानून इन्हीं लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाएंगे. बेहतर होगा कि लेफ्ट और राइट बिना सरकार की मध्यस्ता के मामला आपस में सुलझा लें. क्योंकि दो बंदरों के बीच की लड़ाई में अक्सर बिल्ली रोटी ले जाती है. और इंटरनेट बैन पर चल रही बहस में सरकार वही बिल्ली है

देश-दुनिया:

जब खुद के यहाँ बिजली जाने का कन्फर्म करना हो तो पड़ोसियों के घर पूछा जाता है, “आपके यहां लाइट है क्या?” इंटरनेट-फासिज्म भी आप इसी तरह चैक कर सकते हैं.

पाकिस्तान सरकार ने कुछ ही दिन पहले मीडिया को एडवाइज़री जारी की. नतीजतन पाकिस्तानी मीडिया कश्मीर पर केवल एकतरफा रिपोर्ट लिख रहा है. न जाने किस की शर्म से उसे एडवाइज़री कहा गया है, फतवा नहीं। चीनी मीडिया भी सुबह-शाम दो-दो चम्मच चीन सरकार की ‘एडवाइज़री’ लेती है. नतीजा ये है चीन में फेसबुक और ट्विटर नहीं चलता। लोग VPN से काम चला लेते हैं.

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हारवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हेनरी लुइस गेट्स ने कभी लिखा था:

“Censorship is to art as lynching is to justice.”

“कला पर रोक लगाना वैसा ही है जैसे भीड़ द्वारा न्याय की हत्या कर देना”

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