बीते कुछ दिनों से चीन और भारत के बीच तनाव चल रहा है। गलवान घाटी जैसे संवेदनशील इलाके में 15-16 जून को दोनों देशों के सेनाओं के बीच हुए झड़प के बाद से देश में चीन को लेकर गुस्सा बढ़ा है। चीन की ओर से लगातार उकसाने वाली हरकतें सामने आ रही हैं। लेकिन इन सभी बातों से इतर, सोचने वाली बात यह है कि चीन ऐसा कर क्यों रहा है? चीन का ऐसा करना उसे क्या फायदा पहुंचा सकता है?

चीन एक ऐसा देश है जो पूरी तरह से आर्थिक विकास पर टीका हुआ है। वहाँ की कोम्युनिस्ट सरकार पिछले चार दशकों से आर्थिक विकास को सबसे ऊपर लेकर चल रही है। यही वजह है कि वो लगातार चालीस सालों से सत्ता मे बने हुए हैं। चीन की एक बहुत बड़ी जनसंख्या मिडिल क्लास लाइफस्टाइल की ओर बढ़ रही है। अपनी जनता को संतुष्ट करने, उनके लाइफस्टाइल को मेंटेन रखने और खुद के सत्ता में बने रहने के लिए चीन को जरूरत है अपने आर्थिक विकास को पटरी पर बनाए रखना। चीन ने बीते चार दशकों में जिस गति से विकास किया, यह प्रमाण है उसके महत्वाकांक्षी होने का।

चीन की इस महत्वाकांक्षा में भारत रोड़ा बनता नजर आ रहा है।

ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि चीन अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए लगातार कई डेवलोपमेंट कर रहा है। चाहें वो श्रीलंका का बन्दरगाह हम्बनटोटा हो या फिर एशिया को यूरोप से जोड़ने वाला चीन का प्रोजेक्ट बीआरआई। इन सबकी मदद से चीन अपने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को मजबूत करना चाहता है। लेकिन भारत कई बार इसके बीच आ चुका है। चीन भूटान के साथ मिलकर बीआरआई का विस्तार भूटान तक करना चाहता था। लेकिन भारत ने अपने भूटान से अपने मैत्री सम्बन्धो का उपयोग करते हुए चीन की यह परियोजना रुकवा दी थी। इधर भारत भी लद्दाख में चीन के सीमा तक स्ट्रेटेजिक सड़क का निर्माण कर रहा है। यही स्ट्रेटेजिक सड़क चीन को नागवार गुजारा। चीन को ऐसा लग रहा है कि भारत उसके वन बेल्ट वन रोड के सामने एक चुनौती रख रहा है।

क्या है बीआरआई ?

चीन के पिछले चालीस सालों में हुए विकास को देखें तो उसका कारण स्पष्ट तौर पर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार हीं दिखता है। चीन अपने इस अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में और अधिक विस्तार चाहता है और उसी को ध्यान में रखते हुए वो इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का निर्माण कर रहा है। चीन का मकसद इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के द्वारा दुनिया भर में अपनी पहुँच बनाना और वहाँ अपने व्यापार का विस्तार करना है। बीआरआई से चीन का मकसद एशिया को सीधे यूरोप से जोड़ना है। वह इस मुहिम से अपनी जनता को फायदा पहुंचाना चाहता है। चीन चाहता है कि उसकी आबादी में असंतोष पैदा न हो और नए-नए रोजगार पैदा हों, इसलिए भी यह परियोजना बेहद जरूरी हो जाती है।

Belt and Road Initiative

और भी कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है चीन।

चीन सिर्फ बीआरआई हीं नहीं बना रहा है। इसके अलावा चीन दक्षिण एशिया में वन बेल्ट वन रोड के तहत कई सड़कें और बदरगाह बना कर भारत को घेर रहा है। चीन ने श्रीलंका में जो बन्दरगाह बनाया उसपर अब उसका मालिकाना हक़ है। बीआरआई बांग्लादेश और भूटान में भी बढ़ गया है और सीपीके के जरिये वो पाकिस्तान में भी निर्माण कर रहा है।

बीआरआई में भारत की भूमिका कितनी अहम?

चीन बीआरआई का निर्माण तो कर लेगा लेकिन उसके बीआरआई की सफलता के लिए भारत का होना बेहद जरूरी है। श्रीलंका के हम्बनटोटा बन्दरगाह पर उतारने वाले सामान का 70 फीसदी हिस्सा भारत के लिए आता है। वहीं सीपीके के तहत बीएन रहे ग्वाडर बन्दरगाह भी भारतीय बाज़ारों पर हीं नजर बनाए हुए है। भारत हीं चीन के लिए सबसे बड़ा बाजार है जहां वो निवेश कर सकता है। चीन ने पाकिस्तान में साठ अरब डॉलर का निवेश किया है, वहीं उसने भारत में दो सौ अरब डॉलर का निवेश किया है। यह आंकड़ें काफी है बताने के लिए कि चीन को भारत की जरूरत क्यों है।

कोरोना की वजह से भी चीन को बहुत नुकसान हुआ है।

हुआ यह है कि बीआरआई को लेकर चीन के कर्जदार हुए देशों में भी चीन के प्रति गुस्सा बढ़ा है। यह गुस्सा कोरोना के बाद से और अधिक होता गया है। चीन इस बात से वाकिफ हो चुका है कि यदि अपनी साख बनानी है तो विश्वस्तर पर निवेश करना होगा। इधर चीन के निवेश और कर्जों को लेकर दुनिया भर के देश पहले से ज्यादा सतर्क और चौकन्ने हो चुके हैं।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए चीन के प्रधानमंत्री ने संसद के एक अधिवेशन में वार्षिक रिपोर्ट पढ़ते हुए यह साफ किया कि देश अभी अपनी आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाना है और उसे बरकरार रखना है। इसके लिए वो दो चीजें करेगा, पहला कि वो अंदरूनी खपत बढ़ाएगा और दूसरा अब चीन केवल उच्च गुणवक्ता वाले परियोजनाओं पर हीं काम करेगा। अंदरूनी खपत बढ़ाने से फायदा यह होगा कि विदेशों में व्यापार पर रोक लगने के बाद भी आर्थिक वृद्धि दर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा और दूसरे देशों में जाकर चीन द्वारा हो रहे परियोजनाओं के विरोध का असर भी ज्यादा नहीं होगा।

चीन फिलहाल असहज है।

चीन ने चाहे कितनी भी आर्थिक वृद्धि कर ली हो पर हाल-फिलहाल में उसकी हरकतों ने यह साफ किया है कि वो असहज है। चीन असहज है लद्दाख में बन रही स्ट्रेटेजिक सड़कों से। पिछले चालीस सालों में चीन ने अपनी सीमा में कई पुलों और सड़कों का निर्माण किया है। वो यह भली-भांति जानता है कि इस तरह के निर्माण कार्यों से सेना को मजबूती मिलती है। अब जब भारत भी अपनी सीमा में सड़क और पुलों का निर्माण कर रहा है तो इस बात से चीन असहज महसूस कर रहा है। चीन भारत के एयरफील्ड दौतलबेग ओल्डी को लेकर भी असहज है। उसे लगता है कि भारत इसे स्टेजिंग पोस्ट के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है जिससे चीन के तिब्बत और पाकिस्तान जाने वाली सड़कों को नुकसान पहुँच सकता है।