1997 में रिलीज़ हुई ‘बॉर्डर’ पहली फुली वॉर बेस्ड मूवी थी जो मैंने देखी थी। मेरी छोड़िए, हमउम्र ज्यादातर लोगों के सामने वॉर मूवी के नाम पर बॉर्डर ही आती है। जब भी देखो मूवी के साढ़े तीन घंटे, पूरा जोश से भर देते हैं। देशभक्ति नसों में खून की जगह दौड़ती हुई सी लगती है, पाकिस्तान को दुनिया के नक़्शे से साफ़ कर देने का जज्बा जग जाता है। क्या लड़े थे सब! 120 पैदल सैनिकों ने पाकिस्तानी टैंक बटालियन को नाको चने चबवा दिए थे। उस समय लगता, हाथ में बन्दूक होती तो हम भी 8-10 पाकिस्तानी सैनिक ऊपर पंहुचा ही देते।

बॉर्डर रिलीज़ के बाद 1999 में करगिल युद्ध हुआ था। एक दिन के ‘आज’ पेपर की हेडलाइन आज भी याद है।

‘करगिल युद्ध जारी, पाकिस्तान के 50 सैनिक मरे, भारत के 17 जवान शहीद’

ये देख के फिर ‘बॉर्डर’ की याद आ गई और सीना गर्व से एक्स्ट्रा चौड़ा हो गया। लगने लगा करगिल में भी कोई मथुरादास वक़्त पड़ने पर कायर से अब्दुल हमीद जैसा बहादुर बन गया होगा, दुबक कर बैठा कोई धरमवीर हनुमान की तरह बल याद दिलाने के बाद पाकिस्तानी सैनिकों को मार रहा होगा। देश की मिट्टी से बेइंतेहा प्यार करने वाला भैरो सिंह, हाथ में एन्टी टैंक माइन लेकर पाकिस्तानी टैंक को उड़ाने निकल पड़ा होगा जिसे देखकर टैंक वाला सैनिक डर से “पीछे लो, पीछे लो” बोलने लगा होगा या किसी सुबह कोई कुलदीप सिंह बाजूका लेकर, गले में ग्रेनेड की माला पहनकर पाकिस्तानी सेना और टैंकों पर धावा बोलने निकल पड़ा होगा। फिर जब वो कुलदीप सिंह किसी टैंक का निशाना बनने वाला ही होगा, तो कोई ऐंडी बजवा हंटर प्लेन लेकर चमत्कार की तरह आया होगा और उस टैंक को नेस्तानाबूत करके उड़ गया होगा। इस बीच बैकग्राउंड में “हिंदुस्तान, हिंदुस्तान, मेरी जान हिंदुस्तान” गाना चलता रहा होगा।

बॉर्डर फिल्म का पोस्टर, फोटो सोर्स – गूगल

कितना अद्भुत नजारा लगता था ये। युद्ध के बारे में सोचते ही ये सब याद आ जाता था और याद करते ही गूज़बम्प्स। इस तरह से इस मूवी ने युद्ध को एक ग्लोरी बना दिया था। हालांकि ये अकेला कारण नही है, जिस तरह से आपने युद्ध वाली कहानियां सुनी है, पढ़ी हैं, इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम पढ़ा है, मध्यकालीन रजवाड़ों की लड़ाइयाँ पढ़ी हैं, लता मंगेशकर वाले देशभक्ति के गाने सुने हैं जिनके बीच में ऐसी लाइन्स आती हैं, “दस-दस को एक ने मारा, फिर अपनी लाश बिछा दी।” भरोसा हो चला था कि हमारे सैनिक वार मशीन हैं, दुश्मनों को मार कर ढेर कर देते हैं, उन्हें डर नही लगता, उन्हें दर्द नही होता। इस चक्कर में भूल गए कि उनमें इंसान जैसा कुछ होता है। फिर क्या था, जब भी कोई आतंकवादी घटना होती, मैं युद्ध की पैरवी करने लगता। पाकिस्तान को मिटा देने की सोचने लगता। सिलसिला सालों तक चलता रहा।

कुछ साल पहले एक और वॉर बेस्ड मूवी देखी, ‘सेविंग प्राइवेट रायन’ जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस के ओहमा बीच पर हुए ‘द नोर्मंडी लैंडिंग्स’ ऑपरेशन से शुरू होती है। शुरूआती आधे घंटे की लड़ाई देखकर ये देख के समझ आया कि युद्ध असलियत मे क्या होता है। कुलदीप सिंह की तरह बाजूका लेके दुश्मन को कोई नही मार पाता, भैरों सिंह की तरह गोलियों की बौछारें खाकर भी, कोई जिंदा खड़ा नही हो जाता। गोली आती है, किसी सैनिक की आंख से होते हुए सर का मांस खोल देती है। किसी बम के धमाके में कोई सैनिक अपना एक हाथ खो देता है, फिर वह अपना कटा हुआ हाथ ढूंढने लगता है, ताकि शायद डॉक्टर कोई चमत्कार करके उसे वापस जोड़ दे। कैप्टन किसी घायल सैनिक को मेडिकल हेल्प तक पहुंचाने के लिए हाथ पकड़कर खींच रहा होता है, तब तक दूसरा बम सैनिक के शरीर के चिथड़े उड़ा देता है, कुछ चिथड़े और खून उसके चेहरे पर पड़ते हैं और उसे महसूस होता है कि वो पूरी बॉडी नही, महज एक हाथ, कंधा और उससे जुड़ा सर खींच रहा होता है। किसी ब्लास्ट में किसी सैनिक के पेट से आतें बाहर आ गई हैं, वो उन्हें कराहते हुए समेटने की कोशिश कर रहा है और मेडिकल हेल्प मांग रहा है। घायलों की पट्टी और कटे-फटे हाथ, पैर, पेट, मुंह में टाँके लगाने वाला डॉक्टर खुद खून से लथपथ होता है। जो कराह रहे सैनिकों को मॉर्फीन देते हुए, उनके टाँके सिलते हुए उन्हें “कुछ नही होगा, ठीक हो जायेगा” वाला दिलासा देता है जबकि उसे पता होता है आंतें बाहर निकल आईं हो तो चार टाँके लगाकर आदमी नही बचेगा।

Saving Private Ryan का पोस्टर, फोटो सोर्स – गूगल

तब एहसास हुआ कि जिस चीज को ग्लोरिफाई कर रहे थे, वो कितनी भयानक हो सकती है। जिस चीज की हर चौथे दिन मांग कर रहे थे, उसमे जाने वाले किस मंज़र से गुजरते हैं। एक तरफ की सेना अगर ज्योग्राफिकल एडवांटेज पर हो तो वो दूसरी सेना के सैनिकों का क्या हाल कर सकते हैं। कोई ख़ुशी नही मनाता। युद्ध जीतने के बाद जीतने वाले रोते हैं, क्योंकि उनके आस-पास उनके साथी बिखरे पड़े होते हैं। और हारने वाले रोने के लिए जिंदा नहीं बचते। किसी गहरी नींद से जागने जैसी फीलिंग आई थी उस दिन।

जिस चीज की मांग कर रहे हैं, उस चीज को जानना चाहिए। वहां का मंज़र किसी गार्डन जैसा खूबसूरत नहीं होता, पुलवामा जैसा खौफ़नाक होता है, जो आँखों के सामने आ जाये तो आँखें फट जाएँ और आप शायद बेहोश। दुश्मन देश आक्रमण करे, तो युद्ध रास्ता होता है, करना पड़ता है, वो मज़बूरी है, एक देश और उसकी सेना को उस परिस्थिति के लिए तैयार भी होना चाहिए। किसी के मेंटल सैटिसफेक्शन के लिए युद्ध की बात करना घटिया इग्नोरेंस है।

प्रतीकात्मक तस्वीर(Frank E. Schoonover की पेंटिंग), फोटो सोर्स – गूगल

सैनिक इंसान होता हैं महज़ एक संख्या नहीं, जिनको मौत के मुंह में धकेलने से कोई परहेज़ न किया जाए। समस्या आई, तो समस्या का रूट कॉज एनालिसिस किया जाना चाहिए, वज़ह निकल आने पर उसका इलाज़ ढूंढ़ा जाना चाहिए और फिर इलाज करना चाहिए। न कि सैनिकों की जान की कीमत पर अंधे होकर “बदला, बदला” चिल्लाना चाहिए। जैश-ए-मोहम्मद को कैसे नेस्तानाबूत करना है, इस पर सिक्योरिटी एजेंसीज और इंटेलिजेंस को सोचना चाहिए। इस जैसे और ग्रुप कश्मीर में अप्रभावी कैसे हो, ये सरकार की प्रायोरिटी होनी चाहिए। हमारी मांगें भी सेंसिबल होनी चाहिए, महज़ भावावेश नहीं ,जो शहीदों की चिता की धधक शांत होते ही कमज़ोर होने लगे।

यह आर्टिकल Uraban Fictionary के फेसबुक पेज से लिया गया है।