बीते सोमवार को भारतीय रेलवे से एक अच्छी ख़बर आई और एक बुरी। अच्छी ये कि अब दिल्ली से लखनऊ के बीच बहुत जल्द एक ऐसी ट्रेन चलने वाली है, जिसे एक प्राइवेट कंपनी चलाएगी। बुरी ये कि रेलवे के इस तरह धीरे-धीरे प्राइवेट होने के कड़े विरोध के बावजूद आखिरकार ये पहली प्राइवेट ट्रेन आ ही गई। अब रेलवे अगर प्राइवेट हो जाएगा तो यह यात्रियों के जेब पर सीधा हमला होगा क्योंकि, कोई भी प्राइवेट सेक्टर सुविधा तो देती है लेकिन साथ ही साथ उसके बदले एक मोटी रकम भी वसूल करती है। इसलिए इसका सीधा असर यात्रियों पर ही पड़ने वाला है।

पूरी बात डिटेल में

असल में सोमवार को कुछ सूत्र सामने आए जो कि रेलवे की तरफ से थे। इन सूत्रों के अनुसार रेलवे ने संकेत दिए हैं कि रेलवे अपनी दो ट्रेनों के संचालन की कमान बहुत जल्द प्राइवेट सेक्टर के हाथों में सौंपने जा रहा है। हालांकि, रेलवे का प्राइवेट हाथों में जाना कुछ सालों पहले ही तय माना जा चुका था, जब 2016 में प्राइवेट कंपनी द्वारा चलाई जाने वाली यह ट्रेन आ गई थी।

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तेजस एक्सप्रेस/ फोटो सोर्स- गूगल

इस ट्रेन का नाम ‘तेजस एक्सप्रेस’ है। लेकिन अब जाकर इसे हाल ही में जारी नई समय सारिणी में जगह मिली है। यह ट्रेन दिल्ली-लखनऊ रूट पर चलेगी। हालांकि ये बात भी सामने आई है कि रेलवे प्रशासन दूसरे रूट की भी तैयारी कर रहा है और यह रूट भी 500 किलोमीटर की दूरी के दायरे में ही होगा। अच्छा ये बात भी जान लीजिए कि इस दूसरी रूट पर भी प्राइवेट कंपनी द्वारा संचालित ट्रेन ही चलाई जाएगी।

फिलहाल रेलवे इस निजीकरण को 100 दिन के एजेंडा पर चलाने की कोशिश कर रहा है जिस पर रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि,

‘दो ट्रेनों के साथ यह प्रयोग शुरू किया जाएगा और हमें उम्मीद है कि अगले 100 दिनों के अंदर हम कम से कम 1 ट्रेन को निजी ऑपरेटर के हाथों में सौंपने में कामयाब होंगे। इन रूट्स को चुनने के दौरान ध्यान रखा गया कि रूट्स पर कम भीड़ हो और जरूरी टूरिस्ट स्पॉट कनेक्ट होते हों। जल्द ही दूसरी ट्रेन को भी चुन लिया जाएगा।’

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तेजस एक्सप्रेस के अंदर का दृशय/ फोटो सोर्स- गूगल

मज़ेदार बात तो यह है कि तेजस एक्सप्रेस इस रूट की बहुत ज़्यादा चर्चित और काफी इंतज़ार के बाद आने वाली ट्रेन है। इसलिए इस ट्रेन को लेकर लोगों में काफी चर्चा है। फिलहाल यह ट्रेन उत्तर प्रदेश के आनंदनगर रेलवे स्टेशन की पार्किंग में खड़ी है।  इस ट्रेन को संचालन के लिए बोली की प्रक्रिया शुरू होने के बाद निजी कंपनियों को सौंप दिया जाएगा।

भारतीय रेलवे वित्त निगम (IRFC) ने एक और चीज़ जो बताई है वह यह है कि,  इस ट्रेन की कस्टडी इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) के पास रहेगी, जिसके लिए उसे रेलवे बोर्ड को भुगतान करना पड़ेगा। इस भुगतान में लीज चार्ज से लेकर इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC) की और भी कुछ चीज़ें शामिल है।

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आईआरसीटीसी और आईआरएफसी का चिन्ह/ फोटो सोर्स- गूगल

इन दोनों ट्रेनों को शुरुआत में एक प्रयोग के तौर पर चलाया जाएगा। साथ ही सरकारी सिस्टम का ख्याल रखते हुए, एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ये कहा गया कि ये दो ट्रेनें प्रयोग के आधार पर प्राइवेट कंपनी को दी जाएगी। हमें उम्मीद है कि अगले 100 दिन में हम कम से कम एक को चला पाएंगे।

प्रतीकात्मक तस्वीर/ फोटो सोर्स-गूगल

इस प्लान के तहत शुरुआत में आई आरसीटीसी सिर्फ दो ट्रेनों का संचालन निजी कंपनियों को सौंपेगी। जिसके लिए 10 जुलाई तक प्रस्ताव फ़ाइनल करने को कहा गया है और साथ ही 4 जुलाई को हुई मीटिंग जिसमें रेलवे के मेंबर, ट्रैफिक विभाग व रेलवे के टूरिज्म और कैटरिंग डिपार्टमेंट के अधिकारी शामिल थे, उनके साथ मीटिंग कर इसे रेलवे बोर्ड को जमा कराने को कहा गया है। रेलवे ने एक और बात कही है वो यह है कि 100 दिनों के प्लान में रेलवे के प्रस्ताव में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) और रिक्वेस्ट फॉर कोट (RFQ) जारी करेगी।

ये भी जान लीजिए

अभी फिलहाल दिल्ली-लखनऊ रूट पर कुल 53 ट्रेनें चलती हैं। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि 53 ट्रेनें चलने के बावजूद इनमें से एक भी राजधानी नहीं है। वहीं इस रूट पर चलने वाली सभी ट्रेनों में जिस ट्रेन की टिकटों की मांग सबसे ज़्यादा है, वह स्वर्ण शताब्दी है, जो दिल्ली से लखनऊ तक का अपना सफर लगभग 6.30 घंटे में पूरा करती है।

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तेजस एक्सप्रेस के अंदर का दृशय/ फोटो सोर्स- गूगल

इस ट्रेन के आ जाने से लोगों को सुविधा तो होगी, लेकिन इसकी टिकट शताब्दी एक्सप्रेस से भी लगभग 20 से 30 प्रतिशत ज़्यादा है। यह ट्रेन बहुत आधुनिक सुविधाओं से लेस बताई जा रही है। बाकी जानकारियाँ इस ट्रेन के शुरू होने पर पता चलेंगी। फिलहाल तो रेलवे यूनियन ट्रेनों को निज़ी हाथों में देने के लिए बड़े स्तर पर पुरज़ोर विरोध-प्रदर्शन करने की धमकी दी है। जिस तरह धीरे-धीरे एक-एक करके हमारे देश की सभी सरकारी संस्था और तमाम सर्विस प्राइवेट कंपनियों के हाथों में जा रही है। यह हमारे देश के लिए ठीक नहीं। लेकिन सवाल यह भी है कि जिस तरह की सुविधा सरकारी ट्रेनों में मिल रहा है और जिस तरह की परेशानियों का सामना यात्रियों को करना पड़ रहा है, अगर यही रवैया रहा तो वो दिन दूर नहीं जब सारे यात्री प्राइवेट रेलवे में यात्रा करते हुए नज़र आएंगे। सरकार रेलवे के नाम पर यात्रियों  की जगह माल ढ़ोती ही नज़र आएगी।

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