एक समय हुआ करता था जब बॉलीवुड की एक जोड़ी का इंडस्ट्री में डंका बजता था। इन दोनों की जोड़ियों ने हमें एक से बढ़कर एक फिल्में दी, फिर वो चाहे शोले हो या दीवार। उस वक्त जिस तरह की फिल्में लिखी जाती थीं और जिस तरह से उन्हें फिल्माया जाता था, अगर आज फिल्माई जातीं तो लोगों को शायद फिल्म के हर एक सीन से आपत्ति होती। यह बात उन्हीं जोड़ी में से एक, जावेद अख़्तर का कहना है।

आज जावेद साहब का जन्मदिन है। जावेद साहब न सिर्फ अपनी फिल्मों के लिए बल्कि अपने बेबाकीपन के लिए भी जाने जाते हैं। एक ऐसा दौर जहां कई एक्टर्स को खुद के द्वारा लाइक किए गए ट्वीट पर सफाई देनी पड़ती है। वहीं जावेद साहब खुलकर बोलते हैं कि वो किसी ख़ुदा को नहीं मानते। ऐसे कई मौके आएं हैं जब देश के बड़े-बड़े एंकर्स ने उन्हें अपने शब्दों से घेरने की कोशिश की पर, शायद वो उस वक्त के लिए भूल गए थे कि उनके सामने कौन हैं। आज हम ऐसे कई इंसिडेंट्स में चुनिंदा पांच जवाबों को याद करते हैं और जानते हैं कि कैसे जावेद साहब ने अपने तर्क के बल से सामने वाले की बोलती बंद कर दी थी।

 अरे! फिर तो आप उन्हें सही साबित कर रहे हो। यही तो कह रहा है वो।  

2015 में आमिर खान का इंटोलरेंस वाला बयान याद ही होगा आपको, जिस पर न्यूज चैनल वालों ने न जाने कितने प्रोग्राम कर डाले थे। एक प्रोग्राम में जब जावेद साहब से इस मामले पर राय ली गई तो उन्होंने कहा,

लोग कहते हैं कि हम उसकी (आमिर) ऐसी-तैसी कर देंगे। अरे! फिर तो आप उन्हें सही साबित कर रहे हो। यही तो कह रहा है वो। 

जावेद साहब आगे कहते हैं,

मुझे हैरत होती है जब लोग कहते हैं कि साहब पीके में तो हिंदू धर्म के बारे में आपने इतनी लिबर्टी ले ली, मुस्लमानों के साथ तो नहीं। अरे भाई! कोशिश करो कि वो तुम्हारे जैसे हों इस मामले में, बजाए कि तुम उन जैसे हो जाओ। दूसरी बात यह मुकाबला किसके साथ है? जिस समाज में इस तरह का इंटोलरेंस है उन्हें जाकर देखो न तो क्या हमारा गुण यह है?

यह कश्ती डगमगा सकती है पर डूब नहीं सकती 

देश में चुनाव का माहौल था। उस वक्त एक बड़े मंच से एक बड़े चैनल की महिला एंकर ने जावेद साहब से पूछा कि हवाओं का रूख किस ओर है? जावेद साहब कहते हैं,

यह मैं बताऊंगा? हम तो समझते थे कि आप लोग बताते हैं।

इसके बाद जब महिला एंकर ने फिर से जावेद साहब से उलझने की कोशिश की यह कहकर कि हम तो यही मानते है कि शायर ऐसी ख़बर लिखता है कि जो हमेशा के लिए सत्य रहती है और अमर रहती है। (दरअसल यह सवाल शहरों के नाम बदले जाने पर पूछे गए थे) इस पर जावेद साहब ने बड़े ही शानदार तरीके से जवाब दिया और उन्होंने कहा,

सत्य मैं बताता हूँ कि यह देश कभी डिसबैलेंस हो ही नहीं सकता। पॉसिबल ही नहीं है। मैं अपने खून से लिख सकता हूँ। कश्ती डगमगाती है क्योंकि हम लहरों पर चलते हैं पर ये कश्ती डूब नहीं सकती। याद रखिएगा।

आप एक एंकर हैं और एंकर का काम है न्यूट्रल रहना

CAA को लेकर तमाम तरह की चल रही बहसों के बीच एक न्यूज चैनल की महिला एंकर ने जब जावेद साहब से यह पूछा कि कौन से ऐसे लोग हैं जो अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं? उसके जरिये दरअसल यह बताना चाहते हैं कि अगर ये लागू हो जाती है..मोदी सरकार लागू कर देती है तो फिर….इस पर जावेद साहब कहते हैं,

एक तो आप एंकर हैं और ऐज ऐन एंकर आपको न्यूट्रल लहजे में बात करनी चाहिए। कौन से लोग हैं जो अपनी राजनीति… इससे तो आपकी बायसनेस मालूम पड़ जाती है। इससे मालूम पड़ता है कि आप एक साइड पर हैं। आप एंकर हैं, बीच में रहिये और यह भाषा ग़लत इस्तेमाल कर रही हैं आप।

उस वक्त जब आप उस महिला एंकर के चेहरे पर देखते तो उनके द्वारा की गई ग़लती साफ झलक रही थी। चालाकी मंहगी पड़ गई उस महिला एंकर को।

 एंकर को फ़ैज़ की नज़्म समझाया

एक तो इस देश में हो क्या रहा है, कई बार समझ से परे वाला मामला हो जाता है। ख़ैर, पत्रकार का काम होता है कि मुद्दे को आपके समक्ष रखा जाए। शायद इसी कोशिश में वह एंकर जावेद साहब को उर्दू की नज़्म समझाने की कोशिश कर रहा था। बता दें कि फ़ैज़ की कुछ पंक्तियों से आज कल कुछ सो-कॉल्ड नेशनलिस्ट को परेशानी होने लगी थी और उनकी परेशानी को दूर किया जावेद साहब ने। जावेद साहब के सामने फ़ैज़ की नज्म रखी गई और कहा गया कि इन पंक्तियों से लोगों को आपत्ति हो रही है वह पंक्ति है…सब बुत उठवाए जाएँगे…

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम..
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी

जावेद अख़्तर ने उस नज़्म को समझाते हुए कहा,

सबसे पहले तो इस पंक्ति में काबा का मतलब उस काबा से नहीं बल्कि पूरी धरती से है जो ख़ुदा के द्वारा बनाई गई है। उसके बाद बुत का मतलब समझाते हुए जावेद साहब बताते हैं कि यहां बुत से मतलब है डिक्टेटर, जो इस ज़मीन पर ख़ुदा बना बैठा है। अर्थात अगर यह काबा है तो तुम इस पर ख़ुदा बनकर बैठे हो। इसलिए कि काबे के बुत ख़ुदा थे, तुम्हें हटाया जाएगा।

अगली पंक्ति का मतलब बताते हुए जावेद साहब कहते हैं,

मरदूद-ए-हरम का मतलब कि तख़्त पर वैसे लोग बैठेंगे जो धर्म के द्वारा कंडेंम्ड किए गए हैं। इसके बाद वह अगली पंक्ति का अर्थ बताते हुए कहते हैं, जब तुम्हारा मजहब आया था तो तुमने काबे से बुत हटा दिए। हम कहते हैं कि पूरी दुनिया एक काबा है जहां आप ख़ुद को ख़ुदा समझ बैठे हैं…हम आपको हटा देंगे।

अपने इस जवाब से जावेद साहब ने एक बार फिर साबित कर दिया कि गुरू गुड़ होता है और चेला चीनी।

जब एक क्रांतिकारी पत्रकार ने सांप्रदायिकता पर सवाल पूछा

एंकर का सवाल था कि सांप्रदायिकता के सवाल पर फिल्म इंडस्ट्री सीधी बात क्यों नहीं करती? इसके जवाब में जावेद साहब कहते हैं,

अगर आपको फिल्मों में या फिल्म इंडस्ट्री में यह सब दिखाई दे रहा है इसका मतलब है कि यह हमारे समाज में है। अगर आप हमारा कंपेयर अमेरिका से करते हैं जहां एक्टर ऑस्कर के मंच से ट्रंप की आलोचना करता है और उसकी फिल्म वाशिंगटन और यूरोप में रिलीज होने में कोई दिक्कत नहीं होती है फिर आपको यह भी देखना होगा कि हमारे देश में जहां आमिर एक बयान देते हैं और उसके बाद एक फिल्म में जिसमें वह होते हैं, गुजरात में रिलीज नहीं हो पाती है, जिसका कोई संबंध गुजरात से नहीं था। अगर हमारा सिस्टम एक आदमी को सिक्योरिटी नहीं दे सकता फिर उसमें हम हिम्मत कैसे मांग सकते हैं?

यह आर्टिकल ‘द कच्चा चिट्ठा’ के लिए सत्यम प्रियदर्शी द्वारा लिखा गया है।