ज़िन्दगी में अक्सर उनलोगों को बहुत सम्मान मिलता है जो शून्य से शुरुआत कर के शिखर तक जाते हैं. सम्मान तब और भी बढ़ जाता है जब उस इंसान की ज़िन्दगी देश के लिए समर्पित हो. ऐसे ही इंसान थे लाल बहादुर शास्त्री जी. एक ऐसा महान नेता जिनसे आज के हमारे नेताओं को बहुत कुछ सीख लेने की जरुरत है.

वह इंसान जिसने बचपन से ही कभी स्वाभिमान से समझौता नहीं किया.

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म मुगलसराय में हुआ था.उनके पिता शिक्षक थे. ढ़ाई साल की उम्र में ही शास्त्री जी के सर पर से पिता का साया उठ गया. इसके बाद परिवार का जीवन गरीबी में ही गुजरा. शास्त्री जी जब स्कूल जाते थे तब रास्ते में एक नदी पड़ती थी. कहते हैं की शास्त्री जी स्कूल जाने के लिए रोज नदी तैर कर जाते थे. ऐसा इसलिए ताकि उनको अपने दोस्तों के सामने नाव के किराए के लिए हाथ न फैलाना पड़े.

बड़ों का सम्मान

शास्त्री जी ने एक बार अपने बेटे अनिल शास्त्री को बुला कर कहा की मैं देख रहा हूँ की आप अपने बड़ों का ढंग से पैर नहीं छूते, आपके हाथ उनके घुटनों तक ही रह जाते. अनिल शास्त्री जी से इसका जवाब देते नहीं बन पाया. उनकी खामोशी को देखते हुए शास्त्री जी उठ कर अपने 13 साल के बेटे के पाँव छू कर उनसे कहा की ऐसे करते हैं बड़ो को प्रणाम. यह देख कर अनिल शास्त्री फुट फुट कर रोने लगे. अनिल शास्त्री जी कहते हैं की तब का दिन था और आज का दिन है, मैं अब भी बड़ों का पैर पिताजी के सिखाये तरीके से ही छूता हूँ.

हमेशा की देश की चिंता

लाल बहादुर शास्त्री जी को घर का खर्च चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ से मासिक 50 रुपये मिलते थे. उन्होंने जेल से अपनी पत्नी को ख़त लिख कर उनसे पूछा की उन्हें कोई दिक्कत तो नहीं हो रही है इतने पैसों में घर चलाने में. इस पर उनकी पत्नी ने जवाब लिख कर भेजा की उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, उनका तो घर का खर्च 40 रुपये में ही निकल जाता है और वह 10 रुपये हर महीने बचा भी लेती हैं. इस पर लाल बहादुर शास्त्री ने सोसाइटी को चिट्ठी लिख कर कहा की उनको महीने के सिर्फ 40 रुपये ही दिए जाएँ, उनका घर के कह्र्चे के लिए इतने रुपये काफी हैं.

शास्त्री जी ही वो इंसान थे जिन्होंने पहली बार जनरल डिब्बों में पंखे लगवाए थे. दरअसल एक बार रेल में सफ़र करते हुए उन्होंने जनरल डिब्बों में सफ़र करने का सोचा. वहां पहुँचने पर उन्हें एहसास हुआ की लोग कितने कष्ट में जनरल डब्बों में सफ़र करते हैं. उन्होंने तुरंत जनरल डब्बों में पंखें लगवाने का आदेश दिया. ऐसे ही कई किस्से हैं लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन से जुड़े हुए.

मौत की वजह आज भी रहस्यमय

लाल बाहादुर शास्त्री जी की मौत ताशकंद में हुई थी. दरअसल, भारत पाकिस्तान के बीच 1965 का युद्ध ख़त्म होने के बाद 10 जनवरी 1966 को शास्त्रीजी ने पाकिस्तानी सैन्य शासक जनरल अयूब ख़ान के साथ तत्कालीन सोवियत रूस के ताशकंद शहर में ऐतिहासिक शांति समझौता किया था।

बताया जाता है कि ताशकंद समझौते के बाद कई लोगों ने शास्त्रीजी को अपने कमरे में बेचैनी से टहलते हुए देखा था। शास्त्रीजी के साथ ताशकंद गए इंडियन डेलिगेशन के लोगों को भी ऐसा लगा कि वह काफी परेशान हैं। डेलिगेशन में शामिल शास्त्रीजी के इनफॉरमेशन ऑफ़िसर कुलदीप नैय्यर ने लिखा है,

“रात में मैं सो रहा था कि किसी ने अचानक दरवाजा खटखटाया। वह कोई रूसी महिला थी। उसने बताया कि आपके पीएम की हालत सीरियस है। मैं जल्दी से उनके कमरे में पहुंचा। वहां एक व्यक्ति ने इशारा किया कि ही इज़ नो मोर। मैंने देखा कि बड़े कमरे में बेड पर एक छोटा-सा आदमी पड़ा था।“

कहा जाता है कि जिस रात शास्त्रीजी की मौत हुई, उस रात खाना उनके निजी सर्वेंट रामनाथ ने नहीं, बल्कि सोवियत में भारतीय राजदूत टीएन कौल के कुक जान मोहम्मद ने बनाया था। शास्त्री जी के मौत के दस्तावेज अभी भी सर्वाजनिक नहीं किये गए हैं. 2009 में एक आरटीआई में जब लाल बहादुर शास्त्री जी के दस्तावेज को सामने न लेने का कारण पूछा गया था, तब सरकार की तरफ से जवाब आया था की अगर यह दस्तावेज सामने आ गए तो हमारे बहुत से देशों के साथ संबंध खराब हो जायेंगे.