भारत और साउथ अफ्रीका के बीच अभी तक कई सारे मैच खेले गए हैं। इन दोनों टीमों ने आपस में 39 टेस्ट, 85 वनडे और 16 टी-20 मैच खेले हैं। लेकिन, एक ऐसा भी मैच खेला गया जिसको लेकर आईसीसी के खिलाफ़ बीसीसीआई और साउथ अफ्रीकी बोर्ड के साथ-साथ भारत के सांसदों ने भी आवाज़ उठाई थी। ऐसे में ये मैच भारतीय क्रिकेट हिस्ट्री से कई मायनों में सबसे अलग था। आज कहानी उसी मैच की जिसमें सचिन तेंदुलकर के साथ लगभग 5 भारतीय खिलाड़ियों को अंपायर और मैच रेफरी का गुस्सा झेलना पड़ा था। सचिन तेंदुलकर आज 47 साल के हो चुके हैं। लेकिन, लॉक डाउन की वजह से उन्होंने बर्थडे न मनाने का फैसला किया है। सचिनने  कल यानि 23 अप्रैल को कहा था कि जिस तरह से लोग मेरे न आउट होने की दुआ करते थे, वैसे ही मैं चाहता हूं कि लोग कोरोना के बीच नॉटआउट रहे। खैर, लौटते हैं कहानी पर।

साल 2001, भारतीय टीम साउथ अफ्रीकी दौरे पर थी। टेस्ट सीरीज का दूसरा मैच पोर्ट एलिजाबेथ में खेला जा रहा था। साउथ अफ्रीका ने टॉस जीता और पहले बैटिंग करने का फैसला भी किया। हर्शल गिब्स ने शानदार 196 रन बनाए जिसकी मदद से अफ्रीकी टीम कुल 362 रन तक पहुंची। श्रीनाथ ने पहली पारी में 6 विकेट अपने नाम किए थे। यहां तक तो सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन, बवाल तब शुरु हुआ जब भारत पहली पारी में बल्लेबाजी के लिए मैदान पर आई। इस मैच में दक्षिण अफ्रीका के अंपायर इयान ऑवेल पहली बार अंपायरिंग कर रहे थे। शॉन पोलॉक साउथ अफ्रीका के कप्तान थे।

फोटो सोर्स: गूगल

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पोलॉक जब बॉलिग करने आए तो उन्होंने एक अलग ही रणनीति अपनाई। ये रणनीति थी पहली बार अंपायरिंग कर रहे इयान ऑवेल के ऊपर दबाव बनाने की। उसकी शुरुआत पोलॉक ने भारत के ओपनिंग बल्लेबाज दीपदास गुप्ता के साथ की। पोलॉक की बाहर जाती एक गेंद दीपदास के बल्ले पर लगने के बाद पैर पर जाकर लगी और पोलॉक ने जोर से अपील करना शुरु कर दिया और कुछ देर तक अपील करते ही रहे। जिसके बाद इयान ऑवेल ने दीपदास गुप्ता को LBW आउट दे दिया। इस विकेट के गिरते ही भारतीय टीम पूरी तरह से दबाव में आ गई। दबाव तब और गहरा हो गया जब सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ भी तुरंत पवेलियन लौट गए।

भारत  के ऊपर फॉलोऑन खेलने का खतरा मंडराने लगा। सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण क्रीज़ पर थे। एक बार फिर पोलॉक ने खुद को बॉलिंग अटैक पर लगाया। ऐसा इसलिए क्योंकि मेन अंपायर उस वक्त इयान ऑवेल थे। पिछले विकेट के बाद पोलॉक और अफ्रीकी खिलाड़ी समझ चुके थे कि अगर विश्वास में देर तक अपील की जाए तो इयान ऑवेल दबाव में आते हैं और आउट दे देते हैं। फॉलोऑन का खतरा टालने के बाद वीवीएस लक्ष्मण शतक की ओर बढ़ रहे थे। तभी पोलॉक की गेंद जो साफ दिख रही थी कि लेग स्टम्प के बाहर जा रही है, आकर लक्ष्मण के पैर पर लगी। पोलॉक और नजदीकी फिल्डर्स ने एक बार फिर से आउट के लिए काफी तेज अपील की जिसे नौसिखिया अंपायर ने आउट करार दे दिया। जिसके बाद खूब बवाल हुआ।

शान पोलाक, फोटो सोर्स: गूगल

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भारत की पारी 201 रनों पर खत्म हो गई। जब भारतीय टीम फ़िल्डिंग के लिए मैदान पर आई तब भारतीय बॉलर्स ने भी इसी रणनीति को अपनाने का फैसला किया। साउथ अफ्रीका की दूसरी पारी में भारतीय फिल्डर्स ने हरभजन सिंह और अनिल कुंबले की गेंदबाजी के समय जमकर अपील की। विकेट कीपर दासगुप्ता के अलावा सिली प्वाइंट्स पर खड़े वीरेंन्द्र सहवाग ने भी जमकर अपील की। इसका फायदा भारतीय टीम को मिला भी। अफ़्रीकी बल्लेबाज डिपेनार और लॉंन्स क्लूजनर के बल्ले और पैड से लगकर उछली दो गेंदों पर कैच की अपील को इयान ऑवेल ने स्वीकार कर उन्हें आउट दे दिया। जबकि, ये दोनों ही आउट नहीं थे।

मैच ड्रॉ रहा और जब खत्म हुआ, उसके बाद मैच रेफरी माइक डेनिस ने एक्शन लिया। लेकिन, मैच रेफरी के ऊपर भारतीय खिलाड़ियों ने आरोप लगाया कि यह फैसला दबाव में आकर लिया गया है जो कि किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है।

दरअसल, मैच रेफरी माइक डेनिस ने चार भारतीय खिलाड़ियों के ऊपर अंपायर पर दबाव बनाने के मकसद से ज्यादा अपील करने का आरोप लगाया। इन चार खिलाड़ियों में दीपदास गुप्ता, वीरेन्द्र सहवाग, शिव सुंदर दास और हरभजन सिंह का नाम शामिल था। भारत का आरोप था कि अगर इन चारों पर आरोप लगाए गए हैं तो, पोलॉक को क्यों छोड़ दिया गया। आरोप लगने के बाद 75% मैच फीस काटी गई और एक मैच का बैन लगा दिया गया।

लेकिन, इन सब से हटकर एक और मामला चल रहा था जिस पर मैच रेफरी के द्वारा फैसला सुनाते ही बवाल मचना शुरु हो गया। दरअसल इसी मैच में जवागल श्रीनाथ और अजीत अगरकर के शुरुआती ओवर खत्म होने के बाद गांगुली ने तेंदुलकर को गेंदबाजी के लिए बुलाया था। बारिश होने की वजह से पिच पूरी तरह से गिली थी। गेंद में मिट्टी भी चिपक रही थी। ऐसी स्थिति जब भी होती है तो, हरेक गेंदबाज गेंद साफ करने की कोशिश करता है। सचिन भी वही कर रहे थे।

नियम कहता है कि अगर आप इस तरह की कोई भी एक्टिविटी गेंद के साथ करते हैं तो, ये सब अंपायर के सामने करना चाहिए लेकिन, सचिन की गलती यही थी कि वो अंपायर से पूछे बगैर ही यह काम कर रहे थे। हालांकि, टीवी पर साफ देखा जा सकता था कि सचिन गेंद साफ कर रहे थे न कि उसे ज्यादा घुमाने के लिए छेड़-छाड़ कर रहे थे। इसी की सजा सचिन को दी गई। जिसके बाद पहले से ही भड़की भारतीय टीम और नाराज हो गई।

मैच रेफरी ने सचिन के ऊपर बॉल से छेड़-छाड़ करने का आरोप लगाया। इसके लिए उनके ऊपर एक मैच का बैन भी लगाया गया। सौरव गांगुली जो उस वक्त कप्तान थे, उनके ऊपर भी एक मैच का बैन लगा दिया गया। मतलब एक तरह से ये कहा जा सकता है कि मैच रेफरी माइक डेनिस ने बिना कुछ सोचे-समझे, बिना किसी सबूत के, बिना किसी आधार के सजा सुना दिया था। साफ लग रहा था कि यह फैसला बिल्कुल एकतरफा है। एक साथ 6 भारतीय खिलाड़ियों को मैच से बाहर बैठाना किसी को सही नहीं लगा। सचिन के 12 साल के करियर में यह पहला मौका था जब उन पर किसी भी तरह का आरोप लगाया गया हो। क्रिकेट जगत में उनकी शालीनता और ईमानदारी के उदाहरण दिये जाते थे। ऐसे में उनके साथ हुए इस दुर्व्यवहार से पूरा देश आहत था।

अब जिस देश में क्रिकेट को एक धर्म माना जाता हो, उस देश के खिलाड़ियों के साथ इस तरह का बर्ताव किसी को भी ठीक कैसे लग सकता है। हुआ भी यही, मामला इतना बढ़ गया कि भारतीय संसद में भी इस मामले की गूंज सुनाई दी। भारतीय सांसदों ने कहा कि मैच रेफरी माइक डेनिस ने भारतीय क्रिकेटर्स के साथ ज्यादती की है। अगर भारतीय टीम साउथ अफ्रीका में सम्मान के साथ नहीं खेल सकती तो, उसे वापस बुला लेना चाहिए।

सचिन तेंदुलकर पर जब लगा था बॉल टेंपरिंग का आरोप, फोटो सोर्स: गूगल

सचिन तेंदुलकर पर जब लगा था बॉल टेंपरिंग का आरोप, फोटो सोर्स: गूगल

इस मामले पर विवाद बढ़ता देख बीसीसीआई ने आईसीसी के सामने डेनिस को सेंचुरियन में होने वाले तीसरे टेस्ट मैच से हटाने की शर्त रख दी। लेकिन, आईसीसी ने मैच रेफरी को सही ठहराते हुए शर्त को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद बीसीसीआई और साउथ अफ्रीकी बोर्ड ने साथ होकर एक हैरान कर देने वाला फैसला लिया। दोनों टीमों ने आईसीसी के खिलाफ जाकर सेंचुरियन में खेले जाने वाले तीसरे टेस्ट मैच से मैच रेफरी माइक डेनिस को बाहर कर दिया। आईसीसी ने दोनों बोर्ड्स को चेतावनी भी दी कि अगर ऐसा हुआ तो यह मैच ऑफिशियल नहीं माना जाएगा। लेकिन, दोनों टीमों ने आईसीसी की चेतावनी को इगनोर करते हुए अगला मैच खेला। इतिहास में ये पहली बार हो रहा था कि दो टीमें आईसीसी के खिलाफ हो कर कोई इंटरनेशनल मैच खेल रही हो। पर, मैच खेला गया।

इस मैच के बाद बीसीसीआई और आईसीसी के बीच मतभेद शुरू हो गए। इस मैच के हो जाने के बाद, अगले साल भारत को 03 दिसंबर से इंग्लैंड का दौरा करना था। लेकिन, इंग्लैंड की टीम आईसीसी के फैसले का सपोर्ट कर रही थी। ऐसे में आईसीसी के खिलाफ जाकर इंग्लैंड की टीम यह मैच नहीं खेलना चाहती थी। आईसीसी के फैसले के सपोर्ट में केवल इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की टीमें थीं। बाकी सभी देश इस फैसले का विरोध कर रहे थे। ऐसे में आईसीसी को भी अपने फैसले पर फिर से विचार करने की जरुरत थी।

बीसीसीआई को भी यह दिखाना था कि वह आईसीसी के सामने झुकने वाली नहीं है। मतलब दोनों इस मामले को जल्द सुलझाना चाहते थे। इसके लिए एक लंबी बैठक हुई। जिसके बाद आईसीसी ने गांगुली और सचिन पर लगे आरोप को खत्म कर दिया। साथ ही आईसीसी सेंचुरियन में खेले गए तीसरे टेस्ट मैच को ऑफिशियल मानने पर भी सहमत हो गयी।

जब यह बैठक खत्म हुई, उसके दो दिन बाद माइक डेनिस और आईसीसी के प्रवक्ता जोनाथन हेमुस ने एक बयान दिया जिसमें कहा गया,

‘सचिन तेंदुलकर गेंद से छेड़खानी करने के दोषी नहीं पाए गए हैं। उन्हें जो सजा दी गई थी वह अंपायरों को बताए बिना गेंद से मिट्टी और घास निकालने के लिए थी। ऐसा करना गेंद से छेड़खानी करने से बिलकुल अलग है।’

इस तरह सचिन के पूरे करियर में इकलौता लगा आरोप भी बेबुनियाद साबित हो गया। ये वो किस्सा था जब एक क्रिकेट मैच में कुछ गलत होता देख भारत और साउथ अफ्रीका के खिलाड़ी आईसीसी के सामने डट गए। इस मैच का किस्सा एक नागरिक के तौर पर भी ये मैसेज देता है कि कुछ भी गलत होता देख उसे बर्दाश्त नहीं कीजिये, आवाज़ उठाये। देर-सबेर सवेरा जरूर होता है।