अंग्रेज़ी के महानतम कवियों में से एक पी.बी. शेली ने कहा था कि,

“कविता वो आईना होती है जो विकृत चीजों को खूबसूरत कर देती है।”

मुझे जब भी ये बात याद आती है तो साथ ही हिन्दी के कवि ‘विनोद कुमार शुक्ल’ जी की कविता हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था मेरे ज़हन में एक अजीब सी शांत उदासी लिए आ जाती है और मैं खुद को खामोशी में भी अपने आस-पास के हर शख़्स से बात करते हुए पाता हूँ। मुझे हमेशा से ये लगता है कि इंसानी रिश्तों को बयान करने का सबसे अंतिम और संवेदनशील तरीका ख़ामोशी ही है और विनोद जी की ये कविता उसी ख़ामोशी के इर्द-गिर्द एक बच्चे की तरह खेलती चलती है, जो सब कुछ समझ रहा होता है, सब कुछ जान रहा होता है मगर, किसी से कुछ बोलता नहीं।

विनोद कुमार शुक्ल जी का जन्म साल 1937 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में हुआ था और अभी वो छत्तीसगढ़ के ही रायपुर जिले में रहते हैं। तो, आज की कविता में आप सभी के लिए,

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे

 

~विनोद कुमार शुक्ल