हर तरफ कश्मीर और आर्टिकल 370 की बात हो रही है। जो कश्मीर से नहीं हैं वो सभी खुश हैं, जो कश्मीर के हैं उनका कुछ पता नहीं। इस भीड़ ने एक मुद्दा उठा लिया है। यह भीड़ का मुद्दा है। इस मुद्दे के बहस में आप बाकी सभी मुद्दों को दरकिनार कर देंगे। आप यह तय नहीं कर पाएंगे कि ऑफिस में और ऑफिस से घर जाते हुए सब्जियों के बढ़ते-घटते दाम, इलेक्ट्रिसिटी का बिल, कार की ई एम आई, बच्चे के स्कूल का फीस, इत्यादि बातों पर जो चर्चाएँ हुआ करती थी वो अब गुम क्यों हो गयी? या अब किसी को इन बातों की कोई चिंता रही नहीं है। सभी अब आर्टिकल 370 और 35 A पर हीं बात करते हैं। इस बीच जो चर्चा कहीं गुम हो गई, वो है भारतीय अर्थव्यवस्था।

मोदी जी ने भारतियों को 2024 तक जिस पाँच ट्रिलियन डॉलर का सपना दिखाया था वो सपना बड़ा हीं सादा और खोखला मालूम पड़ता है। भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने यह पूछे जाने पर कि यह हासिल कैसे किया जाएगा इसके जवाब में एक शे’र बोला था। संसद में शे’रो-शायरी चलनी चाहिए यह अच्छी बात है पर जब बात डाटा के अनुसार करते हैं तो ये सभी दावे बेहद हास्यास्पद नजर आते हैं।

सभी बड़े सेक्टर्स जैसे कि मैन्यूफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर और फाइनान्शियल सर्विसेज सभी में एक बड़ी गिरावट देखी जा रही है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने जो आंकड़ें पेश किए थे उससे साफ पता चलता है कि इन सभी आठ बड़े सेक्टर्स के ग्रोथ में 0.2 परसेंट की गिरावट दर्ज की गयी है। इन आठ बड़े सेक्टर्स की इंडस्ट्रियल प्रॉडक्शन में 40 परसेंट की भागीदारी रहती है।

आई आई पी के डाटा के अनुसार, फैक्ट्री आउटपुट ग्रोथ गिरकर 3.1 परसेंट पर आ गया है। अप्रैल-जून महीने में कॉर्पोरेट अर्निंग भी निराशाजन रही है। गांवों से आने वाले गूड्स और सर्विसेज की मांग घट गई है। जब सरकार 5 जुलाई को अपने बजट के साथ सामने आई, तो उसने 11.5 प्रतिशत की मामूली जीडीपी वृद्धि के लिए बजट दिया था, जबकि इस वित्त वर्ष के अंत में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 210 ट्रिलियन रुपये से अधिक था।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई डेव्लपमेंट बैंक दोनों ने 2019 में भारत के विकास दर का अनुमान 7 प्रतिशत तक रखा है। मई में, सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2018-19 के विकास के अनुमान में 6.1 प्रतिशत तक की कटौती की थी, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे धीमी दरों में से एक थी।

फिलहाल सबसे बड़े चिंता का विषय है नौकरियों का न होना। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी दर 6.1 परसेंट तक आ चुकी है जोकि पिछले 45 सालों में अपने सबसे बुरे स्तर को पार कर रहा है। जब यह आंकड़ा बीते जनवरी में बाहर आ गया तब मोदी सरकार ने उसे गलत करार दिया। यह मोदी सरकार के कपटपूर्ण रवैये का एक उदाहरण था।

अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते ट्रेड वॉर का असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है। ब्रिटेन की अपनी खुद की अलग परेशानी है। ईरान पर प्रतिबंध के साथ हीं तेल के बढ़ते दाम से भी भारत को परेशानी हो सकती है। विदेशी निवेशक भी अपने पैसे भारतीय बाजार से बाहर निकाल रहे हैं। मोदी सरकार के लिए यह विचार करने वाली बात है। पाँच ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी के चमकीले सपने को दूर रखते हुए, सरकार को अभी के हालातों पर काम करने की जरूरत है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here