A soldier is never off duty

भले ही ये लाइन आपने पहली बार अक्षय कुमार की फिल्म में सुनी होगी लेकिन, ये कहावत तब से है जब से किसी पहले जवान ने सेना में भर्ती होकर यूनिफॉर्म पहन कर खुद को पहली बार देखा होगा. उस वक्त ही उसे एहसास हो जाता है कि ये सिर्फ कपड़े की कोई आम यूनिफॉर्म नही बल्कि खुद में एक देश की पहचान है, जिस पर ‘एक ज़िम्मेदारी है, एक दायित्व है, एक भरोसा है, एक हिम्मत, एक आस है’ उस देश में रहने वाले हरेक नागरिक की. अब जिस यूनिफॉर्म के साथ इतने कर्तव्यों का एहसास साथ होता है, तो ऐसे में उसे सालों तक पहनने वाले इंसानों का दिल कुदरती रूप से उसी रंग और जिम्मेदारियों में बंध जाता है. जिसे न वो छुट्टी के दौरान भूलते हैं न रिटायरमेंट के बाद. जब भी इनके आस-पास कोई मुसीबत आती है तब ये एक सोल्जर (soldier) की तरह ही उस मुसीबत से टकराते हुए लोगों की रक्षा करने का अपना कर्तव्य (DUTY) निभाते हैं. मतलब आसान और कम शब्दों में बताएं तो, दुनिया के किसी भी देश की सेना में शामिल हर एक जवान का यही फर्ज़ होता है कि, वह जहां हो जिस जमीन पर हो वहाँ मुसीबत में फंसे लोगों की जान बचाये.

आज 26/11 मुंबई हमले की 11वीं बरसी पर हम आपको एक ऐसे ही अंजान सैन्य अधिकारी के बारे में बताएंगे. जो किसी और देश की सेना का जवान था. लेकिन, इत्तेफाक़ से मुंबई में हुए हमले के दौरान ताज होटल में मौजूद था. जिसने अपने सोल्जर होने का दायित्व निभाते हुए हमले में फंसे 157 लोगों की जान बचाई थी. सबसे बड़ी बात यह थी कि, उस दिन न तो यह सोल्जर ड्यूटी पर था और न ही अपने किसी मिशन पर लेकिन, फिर भी हमले में फंसे भारतीय लोगों की जान बचाने के लिए अपनी जान पर खेल गया था, नाम रवि धर्निधिरका.

यूएस मरीन कैप्टन रवि धर्निधिरका, फोटो सोर्स गूगल

यूएस मरीन कैप्टन रवि धर्निधिरका, फोटो सोर्स गूगल

दरअसल, मुंबई हमले के सबसे गुमनाम हीरो, भारतीय मूल के रवि धर्निधिरका ही हैं. जो यूएस मरीन सेना के कैप्टन थे. भारतीय मूल का होने के नाते वो अक्सर अपने घर वालों और रिश्तेदारों से मिलने यूएस से भारत आते रहते थे. रवि धर्निधिरका का परिवार मुंबई के बधवार पार्क के पास रहता है. वहीं उनके अन्य कुछ रिश्तेदार भी मुंबई में रहते हैं.

यू एस मरीन कमांडोज़ की प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

यू एस मरीन कमांडोज़ की प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

बताया जाता है कि साल 2004 से 2008 के बीच रवि लगातार इराक के फालूजा शहर में तैनात रहे. इराक़ मिशन पूरा करने के बाद रवि लगभग 4 साल बाद अपने परिवार से मिलने भारत आए थे. हर बार की तरह इस बार भी कैप्टन रवि मुंबई में अपने परिवार वालों के साथ छुट्टियाँ बिता रहे थे. उन्हें शायद पता नहीं था कि नियति इस बार उनकी छुट्टियों के लिए नया सरप्राइज़ देने वाली है.

अपनी छुट्टियों के दौरान ही एक दिन रवि धर्निधिरका अपने चचेरे भाई, अंकल और अपने कुछ साउथ अफ्रीकन कमांडो दोस्त  के साथ डिनर करने ताज होटल के लेबनानी रेस्टोरेंट ‘सुक’ पहुंचे थे.

ताज होटल से दिखता 'गेट वे ऑफ इंडिया' फोटो सोर्स - गूगल

ताज होटल से दिखता ‘गेट वे ऑफ इंडिया’ फोटो सोर्स – गूगल

हर बार की तरह इस बार भी ताज होटल का माहौल खुशनुमा था जहां भारतीय एवं विदेशी लोग अपने परिवारजनों के साथ ताज के व्यंजनों का आनंद ले रहे थे.

उस वक्त किसी ने सोचा नहीं था कि अगले ही कुछ पलों में ताज समेत पूरी मुंबई में दहशत के काले बादल छाने वाले हैं.

मुंबई हमले के दौरान ताज होटल की एक तस्वीर, फोटो सोर्स - गूगल

मुंबई हमले के दौरान ताज होटल की एक तस्वीर, फोटो सोर्स – गूगल

रवि धर्निधिरका अपने अंकल और भाई के साथ बैठे ही थे कि अचानक से रेस्टोरेंट में बैठे सभी लोगों के मोबाइल की घंटी एक साथ बजने लगी. अगले ही कुछ पलों में रवि के अंकल के पास भी एक फोन आया. जिसके बाद वहाँ मौजूद हर इंसान को समझ आ चुका था कि मुंबई में आतंकी हमला हो गया है.

देखते ही देखते लोगों के पास फोन कॉल्स और न्यूज़ चैनल के जरिए तेजी से लगातार ख़बरें आने लगीं. रवि और उनके आस-पास बैठे लोग इस शॉक से उभर नहीं पाए थे कि तभी होटल के अंदर चीख पुकारों और गोलियों की आवाजों ने दस्तक दे दी थी.

आवाजें सुनकर घबराए लोग इसी सोच में डूबे थे कि आखिर ये हो क्या रहा है. उनके डरे हुए चेहरों पर एक उलझन थी. वहीं दूसरी ओर रवि के चेहरे पर परेशानी और सतर्कता आई. क्योंकि उनके लिए यह माहौल कोई नया नहीं था. गोलियों की आवाज सुन कर वो समझ चुके थे कि, आने वाला वक़्त सबके लिए बहुत मुश्किलों भरा रहने वाला है.

एक सेकेंड को कैप्टन रवि धर्निधिरका ने बाहर जाकर उन आतंकवादियों से मुकाबला करने की सोची लेकिन, हथियारों से लैस जिहादी आतंकियों की मानसिकता को भांपते हुए उन्होंने ठंडे दिमाग से काम लिया और एक सेकेंड गंवाए बिना वो तुरंत खड़े हुए और वहां मौजूद लोगों को बताने लगे कि अब सबको अपनी जान बचा कर यहां से निकलना होगा.

26/11 हमले के दौरान की एक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल

26/11 हमले के दौरान की एक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

कैप्टन रवि होटल की 20वीं मंजिल के जिस रेस्टोरेंट में डिनर कर रहे थे. उस समय वहां लगभग 157 लोग मौजूद थे. रवि तुरंत अपने अफ्रीकन कमांडो दोस्तों के साथ मिल कर लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का प्लान बनाने लगे.

अक्सर हथियारों के साथ मिशन को अंजाम देने वाले जवानों को बिना हथियार के दुश्मनों से लड़ने और लोगों को बचाने के लिए मानसिक रूप से स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है. क्योंकि ऐसी विषम परिस्थितियों में आप सिर्फ दिमाग से ही खुद को और लोगों को बचा सकते हैं.

फोटो सोर्स - गूगल

फोटो सोर्स – गूगल

इसी बीच रवि की नज़र रेस्टोरेंट के काँच के दरवाजे पर पड़ी. दरअसल उन लोगों ने रेस्टोरेंट का दरवाजा तो बंद कर दिया था लेकिन, फिर भी दरवाजे के उस तरफ से आतंकवादी उन लोगों पर ग्रेनेड फेंक सकते थे. इसलिए रवि ने वहां मौजूद सभी लोगों को दूसरे हॉल में चलने के लिए कहा. क्योंकि उस हॉल में दो सीढ़ियों के रास्ते थे, एक बाहर निकलने का तो दूसरा होटल के नीचे माले पर जाने का. रवि तेजी से लोगों को लेकर हॉल के अंदर घुस गए. हॉल का दरवाजा अंदर से लॉक करके दरवाजे के पास उन्होंने सोफे लगा दिए गए थे ताकि गेट आसानी से न खुल सके.

सभी लोगों को अंदर रखकर कैप्टन रवि बार-बार खिड़की से बाहर देखकर पता लगाने कि कोशिश कर रहे थे कि बाहर हो क्या हो रहा है. इसी दौरान अचानक होटल की छठी मंजिल पर जोरदार दो धमाके हुए. जिसकी वजह से लगी आग तेजी से फैलने लगी थी.

रवि ने सोचा कि अगर शॉट सर्किट हुए तो 20वीं मंजिल पर भी आग लग जाएगी जिसकी वजह से यहाँ मौजूद हर आदमी आग के बीच में फंस जाएगा. इतनी नाजुक स्थिति में कैप्टन रवि कोई गलत फैसला नहीं लेना चाहते थे. इसलिए उन्होंने हॉल में मौजूद सभी लोगों से कहा

सेना हमें बचाने आ रही है लेकिन, वो कब तक यहां पहुंचेगी ये नहीं पता’

फोटो सोर्स - गूगल

फोटो सोर्स – गूगल

हॉल में माजूद हर शख़्स कैप्टन रवि को बहुत ध्यान से सुन रहा था. क्योंकि सबको पता लग चुका था कि कैप्टन रवि कौन हैं. एक वही हैं जो इस मुसीबत के समय में बेहतरी से सोचते हुए सबकी जान बचा सकते हैं.

इसी दौरान कैप्टन रवि ने लोगों को होटल की हालातों के बारे में बताते हुए कहा- ‘नीचे की मंजिलों में आग लग चुकी है..अब हमें पीछे की सीढ़ियों से भागना होगा’. इसके अलावा कैप्टन रवि ने सबको एक खास सलाह देते हुए कहा कि, सभी लोग जूते उतार कर भागें और अपने मोबाइल फोन भी ऑफ कर लें.

कैप्टन रवि ने एक रणनीति बनाई जिसमें उन्होंने वहाँ मौजूद पूर्व सेना के कुछ अधिकारियों से चौकन्ने रह कर सबसे आगे चलने को कहा. ताकि बच्चों और महिलाओं को कई खतरा न हो. रणनीति के अनुसार सबने एकता दिखाते हुए उसका पालन किया. लगभग 157 लोगों के समूह में सबसे आगे पूर्व अधिकारी, फिर पुरुष और महिलाएं और बच्चे. इसके साथ ही सबके मोबाइल बंद थे.

फोटो सोर्स - गूगल

फोटो सोर्स – गूगल

घबराए लोग पीछे की सीढ़ियों से होकर नीचे भाग रहे थे. थोड़ी ही देर बाद हॉल में आखिरी रवि बचे थे. सबकी जान सुनिश्चित करते हुए अब रवि नीचे की तरफ भागने जा रहा थे कि उनकी नजर हॉल के कोने में बैठी एक बूढ़ी महिला पर पड़ी.

दरअसल, वो महिला व्हील चेयर पर बैठी हुई थी. कैप्टन रवि ने महिला से कहा आपको नीचे चलना होगा. चूंकि महिला चलने में असमर्थ थी इसलिए उसने रवि से कहा कि तुम मुझे छोड़कर चले जाओ जो होगा देखा जाएगा. लेकिन, कैप्टन रवि महिला को अकेला नहीं छोड़ सकते थे. बिना वक्त गंवाए कैप्टन रवि ने महिला को अपनी गोद में उठाया और तेजी से नीचे उतरने लगे.

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स - गूगल

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स – गूगल

20वीं मंजिल से एक महिला को अपनी गोद में लेकर उतरना आसान काम नहीं था लेकिन, कैप्टन रवि ने हार नहीं मानी.

वहीं दूसरी तरफ नीचे आ चुके लोगों की निगाहें सीढ़ियों पर रवि के आने के आने के इंतजार में टिकी हुई थीं. कुछ ही समय बाद लोगों ने देखा कि रवि एक बूढ़ी महिला को गोद में लिए बाहर आ रहे हैं. जिन्हें देख कर सबकी आँखें खुशी के मारे भर गईं थी.

कैप्टन रवि ने अपनी असाधारण बहादुरी, हिम्मत और समझदारी का परिचय देते हुए 157 लोगों की जान बचाई थी. रवि धर्निधिरका न सिर्फ इन 157 लोगों के बल्कि पूरे देश के लिए हीरो बन चुके थे.

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