साल 1999 में हुए कारगिल युद्द की यादें हमारे आपके जेहन में आज भी ताजा है. इस युद्ध में भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान के नापाक मसूबों पर पानी फेरते हुए धूल चटाई थी. हालांकी इस जीत के लिए हमने अपने शूरवीरों को खोया था. इन शूरवीरों ने देश के लिए अपना सर्वोच बलिदान देते हुए जिस अदम्य साहस और पराक्रम का परिचय दिया था उसकी कहानियां आने वाले कई दशको तक सुनाई जाती रहेगी.

आज हम एक ऐसे ही सौर्य और पराक्रम की कहानी से आपको रूबरू कराते है. जिसने आखिरी सांस तक दुश्मनों से लड़ते हुए कारगिल की 4875 फिट की ऊंचाई पर तिरंगा फहराया था.नाम था ‘परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा’.

शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा, फोटो सोर्स – गूगल

7 जुलाई 1999 को जिस 4875 की चोटी पर कप्तान विक्रम बत्रा शहीद हुए थे, सरकार ने उस चोटी का नाम बत्रा टॉप दिया है. आज 7 जुलाई के दिन विक्रम बत्रा की शहादत दिवस के मौके पर उनके भाई विशाल बत्रा ने उस चोटी पर जाकर तिरंगा फहरा कर अपने भाई को श्र्द्धांजली दी है.

रविवार को कैप्टन बत्रा की शहीदी दिवस पर 14 कोर कमांडर लेफ़्टिनेट जनरल वीके जोशी, 13 जम्मू कश्मीर राइफल्स और यूनिट के कमांडर अफसर के साथ विशाल ने उस चोटी पर तिरंगा फहराया. इस दौरान उहनोने कहा कि मेै बहुत इमोशनल हो गया था जिस कारण मै अपने माता-पिता से ज्यादा कुछ कह नहीं पाया. शायद मै उनसे सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि ‘ये दिल मांगे मोर’

सैन्य अधिकारियों के साथ बत्रा टॉप पर तिरंगा फहराते हुये भाई विशाल बत्रा, फोटो सोर्स – गूगल

कैप्टन विक्रम बत्रा

कैप्‍टन विक्रम बत्रा का जन्‍म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर जिले के घुग्‍गर में हुआ था. उनके पिता का नाम जीएम बत्रा और माता का नाम कमलकांता बत्रा है. विज्ञान विषय से स्नातक करने के बाद विक्रम बत्रा ने सीडीएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर सेना में शामिल हो गए. जुलाई,1996 में उन्होंने देहारादून की भारतीय सेना अकादमी में प्रवेश लिया. विक्रम बत्रा की पहली नियुक्ति 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर में सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर हुई. इस दौरान विक्रम बत्रा ने कमांडो ट्रेनिंग पूरी की. 1 जून, 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया. हम्प व राकी नाब स्थानों पर जीत का तिरंगा फहराने के बाद विक्रम बत्रा को सेना में कैप्टन बना दिया गया.

कारगिल युद्द 

इसके बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर 5140 पर रणनीति के रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने की ज़िम्मेदारी सौपी गयी. इतनी दुर्गम ऊंचाई होने के बाजूद कैप्टन विक्रम बत्रा बिना समय गवाएं अपनी टुकड़ी को लेकर चोटी पर चढ़ गए। महज 30 मिनट के अंदर विक्रम बत्रा ने पाकिस्तानी सैनिको को खदेड़ कर चोटी पर कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया. इस मिशन के दौरान कप्तान बत्रा का कोड नेम ‘शेर शाह’ रखा गया था. बाद में उन्हें ‘कारगिल का शेर’ की भी संज्ञा दे दी गई.

कैप्टन विक्रम अपने साथियों के साथ , फोटो सोर्स – गूगल

चोटी पर कब्जा कर तिरंगा फहराने के बाद कप्तान विक्रम बत्रा ने रेडियो के जरिये अपना विजय संदेश दिया. संदेश में उन्होंने कहा था ‘ये दिल मांगे मोर. कैप्टन विक्रम बत्रा का विजयी संदेश सुनकर सेना समेत पूरा देश खुशी से झूम उठा था. पूरे देश ने कैप्टन विक्रम बत्रा और उनकी टीम के असाधारण पराक्रम और बहादुरी को सलाम किया.

ये वो विजयी फोटो जिसके बाद पूरा देश कैप्टन विक्रम बत्रा का दीवाना हो गया था. फोटो सोर्स – गूगल

इसके अगले ही दिन भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो अखबारों में छपी तो सारा देश कप्तान विक्रम बत्रा का दीवाना हो गया था.

इस मिशन के खत्म होने के बाद विक्रम बत्रा को एक और 4875 मीटर की ऊंचाई वाली चोटी से पाकिस्तानी सैनिको को खदेड़ने का काम सौपा गया. इस मिशन पर उन्होंने अपने साथी लेफ़्टिनेनेट अनुज नैयर के साथ मिलकर कई पाकिस्तानी सैनिको को मार गिराया था.

मिशन लगभग पूरा हो गया था पर तभी कैप्टन बत्रा एक विस्फोट में घायल अपने साथी लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए आगे बढ़े. जब विक्रम बत्रा अपने साथी को घसीटते हुये आगे बढ़ रहे थे तभी उनके सीने पर गोली लगी. गोली लगने के बाद कैप्टन बत्रा ‘जय माता दी’ बोलते हुये वीरगति को प्राप्त हुये.

कैप्टन विक्रम बत्रा और लेफ्टिनेंट अनुज नय्यर को युद्द के दौरान असाधारण वीरता और साहस का परिचय देते हुये वीरगति को प्राप्त हुये जिसके लिए उनको सेना के सर्वोच सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. कैप्टन विक्रम बत्रा और लेफ़्टिनेट अनुज नय्यर चोटी पॉइट 4875 पर कब्जे के दौरान शहीद हुए.

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