भारत आदिकाल से पृथ्वी का मात्र एक टुकड़ा ही नहीं अपितु विश्व के समस्त देशों की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। भारत योग, अध्यात्म एवं संस्कृति की एक मिसाल है, जिसके बिना संसार की खोज अधूरी हैा यह देश पवित्र देवात्माओं एवं ऋषिमुनियों की धरती है, जिन्होंने तप करके इस धरती को पवित्र बनाया है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो भारत सम्पूर्ण मानवजगत के लिए एक खजाना है। खजाना इसलिए नहीं कि भारत धनकुबेरों और राजा-महाराजाओं की नगरी रहा है, बल्कि हिन्दुस्तान योग, अध्यात्म, विविध संस्कृति एवं सत्य जैसी अनेक संपदाओं का देश है। लेकिन इस खजाने को कभी मुगलों, तो कभी अंग्रेजों ने इस कदर लूटा था, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है।

 

आर्थिक दृष्टि से कमजोर करने के साथ-साथ भारत को अनेक जाति व धमों में बांटा गया, जिसके कारण आजादी के 70 वर्ष बाद भी भारत की जनता मानसिक रूप से गुलाम है। देश तथाकथित राजनैतिक व धार्मिक सौदागरों द्वारा धर्म, जाति और सिद्धांतों के नाम पर गुलाम है।

इन सौदागरों ने मनुष्य को अपने-अपने सिद्धांतों की जंजीरों में जकड़कर बांटा हुआ है। सौदागर चाहे राजनैतिक हो या धार्मिक, बांटना और राज करना उनका एक मात्र सूत्र है। वे बांट रहे हैं लोग बंट रहे हैं। वे लड़वा रहे हैं, लोग लड़ रहे हैं। जनमानस के आपस में लड़ने, धर्म व जाति के नाम पर अन्धे हुये जाने के कारण ही आज सत्ताधारियों की कीमत और धर्मगुरुओं की जरूरत है। वरना मनुष्य स्वयं में इतना परिपक्व है कि उसे किसी की गुलामी की आवश्यकता नहीं है और न ही उन बेढ़ियों व जंजीरों में जकड़े रहने की जरूरत है, जो अप्रासंगिक रूप से समाज पर थोपी जा रही है। परन्तु आज इंसान जंजीरों में इतना जकड़ चुका है कि बाहर निकलना नामुमकिन सा प्रतीत हो रहा है।

विश्व प्रख्यात दार्शनिक ओशो ने अपनी एक पुस्तक ‘‘भारत एक अनूठी सम्पदा’’ में लिखा है कि ‘‘गुलामी के अनेक ढंग हैं, अनेक रूप हैं। जंजीरे अनेक रंगो में सोने चांदी से सजी हुई है, कि आभूषण के समान प्रतीत हो रही है। इन जंजीरों के अनेक धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक नाम व सिद्धांत हैं। लेकिन जंजीरे कितनी भी सोने-चांदी से मंढ़ी हो, बेढ़िया कितने ही हीरे-जवारात से जड़ी हो, बेढ़िया-बेढ़िया होती हैं और कारागृह संगमरमर से ही क्यों न बनवाया गया हो, कारागृह-कारागृह ही होता है, खुला आसमान नहीं, जहां पंछी स्वतन्त्रता पूर्वक पंख फैैलाकर गगन चूम सके’’।

यह दशा भारत की ही नहीं अपितु पूरे विश्व की है। तथाकथित राष्ट्र – धर्म, जाति व रंग के आधार पर भेदभाव कर रहे हैं। इसी कारण पृथ्वी अनेक भू-खूण्डों में विभाजित हो रही है। आज हर कोई अपना धर्म और अपना धन खोज रहा है। अधिकांश व्यक्ति संसार को जीत जाता चाहते हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो मनुष्य सोया हुआ प्राणी है जिसे तनिक भी ज्ञात नहीं कि वह क्या और क्यों कर रहा है। मनुष्य अपनी चेतना के शिखर पर पहुंचने से पूर्व ही, सांसारिक चकाचैंध में मशगुल हो गया है। यदि मनुष्य को ज्ञात होता की वह क्या और क्यों कर रहा है, तो पिछले 03 हजार वर्षों में अहंकार, धर्म, जाति, राष्ट्रहित और संसार में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए सैंकड़ों युद्ध न करता।

आज हर कोई अपने-अपने धर्मानुसार धार्मिक स्थलों का निर्माण करवा रहा है। न जाने क्यों हर मोड़ पर एक नवीन धर्म, जाति, भगवान का निर्माण किया जाता है। समस्त धार्मिक ग्रन्थों में लिखा है कि ‘‘ईश्वर एक ही है’। युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार -‘‘अच्छे कर्मों का समुच्चय ही भगवान है’’। परमाात्मा इंट की दीवारों व संगमरमर और सोने-चांदी से निर्मित मंदिरों में नहीं, अपितु कण-कण में निहित हैं। बावजूद इसके, आज कोई राम को अपना कहता है तो कोई शिव को, कोई कृष्ण को तो कोई बुद्ध आदि को, जिससे प्रतीत होता है कि भगवान पर सभी लोगों की अपनी-अपनी मोनोपाॅली है।

वर्तमान में ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकतर लोग ‘डर’ की वजह से पूजा करतेहैं और पूजा-अर्चना करने के पीछे कहीं न कहीं वह अपना स्वार्थ चाहते हैं। वास्तविक पूजा शायद बहुत कम लोग करते हैं। मनुष्य के अन्दर ‘डर’ की यह भावना तथाकथित धार्मिक सौदागरों द्वारा स्थापित की जाती है, जो भगवान और धार्मिकता के नाम पर जन को पथभ्रष्ट कर रहे हैं।

मनुष्य इन सभी बेढ़ियों में इस कदर गहराईयों तक जकड़ा हुआ है कि मानव दानवीय रूप में परिवर्तित होता जा रहा है। जैसे सड़क पर श्रीमदभगवदगीता या कुरान फटी पड़ी हो तो, हिन्दु-मुसलमान दानवीय रूप धारण कर लेते हैं। लेकिन यदि पूछा जाए कि कितनों ने गीता-कुरान पढ़ी है तो 90 प्रतिशत व्यक्ति मौन धारण कर लेगें। यह कार्य सोए हुए इंसान का नहीं है तो फिर किसका है? क्या जागा हुआ इंसान ऐसा कार्य करता है?

भारत जगतगुरु है, किन्तु आज यही जगतगुरु अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। यहां आवाम इस तरह विभाजित है कि सभी के एक होने की मात्र कल्पना ही की जा सकती है। ओशो के अनुसार सात दशक पश्चात भी भारत एक ऐसा देश है जहां युद्ध करने वाले को तख्त मिलता हो, तो प्यार की भाषा बोलने वाले को कारागृह। यहां भीड़ में चलने वाले को हार पहनाए जाते हैं, तो वहीं अकेले चलने वाले को पागल समझा जाता है। यहां स्त्री को निर्वस्त्र होते सभी देखते हैं, किन्तु उसकी रक्षा, अधिकार एवं सम्मान में बहुत कम हाथ खड़े होते हैं। यहां तमाशा देखने वाले तो अनेक हैं, लेकिन निस्वार्थ भाव से मद्द करने वाले शायद बहुत कम हैं। यहां आवाज उठाने वाले की आवाज दबा दी जाती है और दबे-सहमें रहना सभी को भांता हैं।

आज मनुष्य अपने दिमाग से कार्य नहीं कर रहा है, अपितु सौदागरों का हुक्मरान बनकर उनकी सोच की तामीर कर रहा है। गौरतलब है, कि ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को मस्तिष्क व सोच दी है, ताकि इंसान अपने बारे में स्वयं सोच सके, किन्तु आजकल शायद इसके विपरीत हो रहा है।

मैं यह नहीं कहना चाहता हूं कि सभी धर्मगृरु व राजनेता, जनप्रतिनिधि पाखंडी हैं। लेकिन अधिकांश सौदागर जनता को भटका रहे हैं और आम-जन की मान्यताओं को अपने स्वार्थ की ढ़ाल बनाकर इस्तेमाल कर रहे हैं। आज इन्ही सौदागरों के स्वार्थ मात्र हेतु महाशक्ति बनने की ओर तीव्र गति से अग्रसर भारत अपनी आंतरिक मानसिकता से द्वंद्व कर रहा है। मनुष्य को बेढ़ियों व जंजीरों से स्वयं को मुक्त कराने की आवश्यकता है, ताकि सभी को एक समानता मिल सके और धर्म के नाम पर समानता स्थापित हो सके, क्योंकि धर्म किसी बाहय जगत में नहीं अपितु स्वयं के अन्दर आत्मा में निहित है।

(ओशो की पुस्तक भारत एक अनूठी संपदा के विश्लेषण पर आधारित लेख)

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