संसद में इस वक्त  नागरिक संशोधन बिल को लेकर काफी बहस चल रही है। इस बिल पर कल देर रात तक चर्चा होती रही। आरोप-प्रत्यारोप का कार्यक्रम भी खूब चला। साथ ही बीजेपी कांग्रेस को और विपक्ष, पक्ष को गलत साबित करने में लगा रहा। अमित शाह के अनुसार तीन देशों (बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान) में मुस्लिम को छोड़ कर बाकी सभी धर्मों को प्रताड़ित किया गया है। शायद अमित शाह को पाकिस्तान में हुए सिया डॉक्टर्स की हत्या की याद न आई हो। अगर ये तीन देश छोड़कर बीजेपी के नेता बाकी के पड़ोसी देशों म्यांमार और नेपाल में झांक कर देख लेते, तो शायद उनका विजन क्लियर हो जाता कि साफ और शांत दिखने वाले बौद्ध धर्म ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर कितना अत्याचार किया है और मुसलमानों को प्रताड़ित किया है।

लेकिन, विपक्ष इस वक्त एक ही सवाल कर रहा है कि अगर देश का संविधान धर्म के आधार पर नहीं है तो, फिर इस बिल में विशेष धर्म का दर्जा क्यों दिया जा रहा है? इस पर अमित शाह का कहना था कि धर्म के आधार पर कांग्रेस ने विभाजन किया था, हमनें नहीं। अमित शाह के इस बयान के बाद एक बात यह जान लेना जरुरी है कि आखिर कांग्रेस के किस फैसले को धर्म के आधार पर विभाजन बता रहे हैं। अगर धर्म के नाम पर संविधान का निर्माण होता तो, भीमराव अम्बेडकर ने आखिर ऐसा क्यों कहा था कि

अगर हिंदू राज एक तथ्य बन गया तो यह देश के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा। यह लोकतंत्र के खिलाफ है। इसलिए हर हाल में हिंदू राज को रोका जाना चाहिए।  

अब अमित शाह जिस आधार पर कांग्रेस के ऊपर धर्म विभाजन का आरोप लगा रहे हैं उसे भी समझ लेना चाहिए। दरअसल, कांग्रेस के समय में भी सारा विवाद असम से ही शुरु हुआ था। इस वक्त बीजेपी NRC लाकर विवादों में है तो, उस वक्त विवाद की सबसे मुख्य वजह थी IMDT (Illegal Migrants Determination by Tribunal).

क्या रहा है IMDT का इतिहास?

साल 1971 में पाकिस्तानी सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में दमनकारी नीति अपनाते हुए लोगों को भगाना शुरु किया। जिसके बाद लगभग 10 लाख लोगों ने पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम में शरण ली। बांग्लादेश बनने के बाद ज्यादातर लोग वापस लौट गए लेकिन, एक लाख लोग असम में ही रह गए। इसके बाद असम के किसानों को डर सताने लगा कि शायद बांग्लादेश से आए लोग उनकी जमीन पर कब्जा कर लेंगे। इस मामले को लेकर रुख कड़ा होता गया और फिर आखिर में साल 1978 में असम के किसानों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने शरणार्थियों के खिलाफ आंदोलन शुरु कर दिए।

किसानों के इस आंदोलन की अगुवाई वहां के युवाओं और छात्रों ने की। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) और ऑल असम गण संग्राम परिषद ने इसकी अगुवाई की। इस आंदोलन का एक और कारण था। 1978 में असम के मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद की मृत्यु के बाद उपचुनाव हुए। चुनाव आयोग ने पाया कि अचानक से मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हो गई। माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशियों के आने के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। फिर क्या था, आंदोलन की शुरुआत हो गई।

यह सब अभी चल ही रहा था कि साल 1983 में असम में हुए नीली दंगे ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इसमें 24 घंटे के भीतर ही करीब 2,000 लोगों की हत्या कर दी गई। इसके बाद ही यहां IMDT बिल लागू कर दिया गया। इस क़ानून के तहत अवैध आप्रवासी की नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व शिकायतकर्ता का था। जिसके बाद ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) की अगुवाई में चल रहे आंदोलन और बढ़ गया। साल 1984-85 में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई। तब जाकर राजीव गांधी की सरकार को मजबूर होकर समझौता करना पड़ा।

साल 1985 में राजीव गांधी की केन्द्र सरकार ने AASU और ऑल असम गण संग्राम परिषद से समझौता करते वक्त कुछ शर्तों पर साइन किया।

भारत और पूर्वी पाकिस्तान विभाजन के बाद (1951 से 1961 के बीच) असम आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट का अधिकार दिया जाएगा।

– 1961 से 1971 के बीच असम आने वालों को नागरिकता और अन्य अधिकार दिए जाएंगे लेकिन, उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होगा।

– असम को आर्थिक विकास के लिए विशेष पैकेज भी दिया जाएगा।

– असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किए जाएंगे।

– 1971 के बाद असम में आने वाले विदेशियों को वहां का नागरिक नहीं माना जाएगा, उन्हें वापस लौटाया जाएगा।

असम में बैठक के दौरान राजीव गांधी और अन्य ,फोटो सोर्स: गूगल

असम में बैठक के दौरान राजीव गांधी और अन्य ,फोटो सोर्स: गूगल

इसके बाद से यह कानून चलता रहा। लेकिन, साल 2005 में जब मनमोहन सिंह की सरकार थी। सुप्रीम कोर्ट में IMDT के खिलाफ एक याचिका दायर की गई और फिर कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया। जिसके बाद असम गण परिषद के सांसद सर्वानंद सोनोवाल ने याचिका दायर की जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि असम में ग़ैरक़ानूनी तरीके से रहने वाले बांग्लादेशियों की बढ़ती संख्या ने राज्य में क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है। लेकिन, कोर्ट ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया।

इसके बाद साल 2006 में मनमोहन सिंह की सरकार ने एक फैसला लिया। सरकार ने विदेशी नागरिक क़ानून में ऐसा प्रावधान करने की योजना बनाई, जिसके तहत किसी व्यक्ति को अवैध आप्रवासी करार देने से पहले उसे ट्रिब्यूनल के तहत सुनवाई का मौका दिया जाए। जब पीएम मनमोहन सिंह असम का दौरा कर रहे थे तो उसी दौरान उन्होंने अल्पसंख्यकों को आश्वासन दिया था कि उनके वैधानिक हितों की रक्षा की जाएगी। बीजेपी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया था कि आईएमडीटी क़ानून के निरस्त होने के बाद सरकार पिछले दरवाज़े से इस क़ानून को लाने की कोशिश कर रही है। सरकार ने ये फ़ैसला असम और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले किया था और जानकार इसे अल्पसंख्यकों को खुश करने की मुहिम मान रहे थे।