आपको याद हैं आपके पहले शिक्षक? नहीं होंगे। ये याद रखना इतना ज़रूरी भी नहीं मगर ज़रूरी है सावित्रीबाई फुले को याद रखना जो हमारे देश की पहली महिला शिक्षक थीं। क्या सिर्फ इसलिए उन्हें याद किया जाए? क्या उनकी यही पहचान है?
बहुत कुछ है जिसके लिए सावित्रीबाई फुले को पढ़ना, जानना, समझना और याद रखना ज़रूरी है।
जिस वक़्त देश में जातिवाद का कट्टरतम रूप चरम पर था, दलितों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नही थी जिस पर कोई सवर्ण हिन्दू चल रहा हो. उन्हें अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधने को कहा जाता ताकि सवर्ण इन्हें भूल से न छू लें. कमर में झाड़ू बांधकर चलने का आदेश था ताकि, इनके पैरों के चिन्ह झाड़ू से मिट जाएं और कोई सवर्ण हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाए। अछूत अपने गले में हांडी बांधकर उसी में थूकने को मजबूर थे ताकि किसी सवर्ण हिन्दू का पैर उनके थूक पर न पड़ जाये और वो अपवित्र न हो जाएं। उसी वक़्त 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में न सिर्फ जातिवाद बल्कि नारीदमन को चुनौती देने के लिए सावित्रीबाई फुले का जन्म होता है।
उस वक़्त की रूढ़िवादी सोच के चलते 9 वर्ष की आयु में उनकी भी शादी 13 वर्षीय ज्योतिबा फुले के साथ करा दी गई।
सावित्री की पढ़ाई में रुझान देख कर ज्योतिबा उनको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और पढ़ाने के प्रशिक्षण के लिए एमएस फरार संस्थान भेज देते हैं।
1848 में पढ़ाई पूरी कर के सावित्रीबाई वापस आ कर एक विद्यालय खोलती हैं मगर उनकी जाति की वजह से और उनके महिला होने की वजह से कोई भी अपने बच्चों को उनके विद्यालय में पढ़ने नहीं भेजता। सावित्रीबाई लोगों को पढ़ाई के बारे में जागरूक करने घर-घर जाती हैं मगर तब भी काम न बनने पर वो बच्चों को विद्यालय आने पर कुछ पैसे देने की बात रखती हैं और जो बच्चे पैसों के लिए पढ़ाई छोड़ कर कुछ और काम करते थे वो आना शुरू कर देते हैं। सावित्रीबाई ने ही सबसे पहले अपने विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक मीटिंग (PTM यानि Parents Teacher Meeting) की शुरुआत की। उन्होंने किसानों और मजदूरों के लिए रात्रि विद्यालय भी शुरू किया जिससे वो दिन में अपना रोजगार कर सकें और रात में पढ़ाई।
सवर्ण समाज ने जब सावित्रीबाई और उनकी इस सोच का विरोध करना शुरू किया तो 1849 में उन्हें उनके पिता ने घर से निकाल दिया। मगर उनके अंदर के पढ़ाने के जज़्बे को नहीं निकाल पाए। घर से निकलने पर उन्हें उस्मान शेख़, जो उनके मित्र थे, ने रहने और विद्यालय चलाने के लिए घर दिया। जहां उस्मान की बहन फातिमा, जो बहुत पढ़ी लिखी थीं, और सावित्रीबाई ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। वर्ष 1852 तक वो 3 विद्यालय चलाने लगे।
1858, आजादी का पहला विद्रोह हो चुका था, ब्रिटिश सरकार नया कानून लाई और अंग्रेज़ मिशनरीज से फंड आना रुकते ही अब तक चल रहे 3 विद्यालय बन्द हो गए। इस त्रासदी के बाद भी कठिन संघर्ष के साथ उन्होंने फिर से लगभग 17-18 विद्यालय और 2 शैक्षिक संस्थान खोल दिए।
सावित्रीबाई ने न सिर्फ लोगों को शिक्षा के लिए जागरूक किया बल्कि उन्होंने नारी अधिकार और सम्मान पर भी बहुत काम किया और जागरूक किया। सबसे पहले एक महिला सेवा मंडल की शुरुआत की, जिसका लक्ष्य महिलाओं को उनके अधिकारों, सम्मान और सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूक करना था।
भ्रूण हत्या भी उस वक़्त बहुत ज्यादा होती थी, इसलिए उन महिलाओं को जिनको इसका सामना करना पड़ता था, उनको सुरक्षा देने के लिए भी कई केंद्र खोले।
इतिहास बताता है कि जब भी कोई समाज के बने-बनाए ढांचे को तोड़ने या बदलने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ पूरा समाज खड़ा हो जाता है और सावित्रीबाई ने तो शिक्षा और औरत, दो ढांचों को तोड़ने की ठानी थी तो उनको तो भारी विरोध का सामना करना ही था। सावित्रीबाई जब घर से पढ़ाने के लिए निकलती थीं तो उन्हें दो-दो साड़ियां पहननी पड़ती थीं। वजह ये थी कि उनके ऊपर उनकी सोच के विरोध में लोग गोबर, पत्थर फेंकते थे और गलियां दिया करते थे, जिनमें ज्यादातर उनके खुद के रिश्तेदार थे। मगर वो न डरीं, न ही अपने लक्ष्य को बदलने की सोची बल्कि और ज्यादा जोश के साथ आगे बढ़ती रहीं।
24 सितंबर 1873. ज्योतिबा फुले पुणे में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना करते हैं। सावित्रीबाई उसकी सदस्य बनती हैं। ज्योतिबा फुले को सत्यशोधक (सत्य को ढूंढने वाला) समाज की प्रेरणा तब मिली जब अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें अपमानित होना पड़ा और घर आ कर अपने पिताजी से इसका कारण पूछने पर पिताजी ने बताया कि
सदियों से यही सामाजिक वयवस्था है, हमारे सभी धर्मग्रंथों एवं शास्त्रों में यही लिखा है और हमें भी यही मानना पड़ेगा क्योंकि यही परम्परा व परम सत्य है।
ज्योतिबा ने सोचा कि धर्म तो जीवन का आधार है फिर भी धर्मग्रंथों और शास्त्रों में ऐसा क्यों लिखा है? अगर सभी जीवों को भगवान ने बनाया है तो मनुष्य-मनुष्य में विभेद क्यों है? कोई ऊँची जाति, कोई नीची जाति का कैसे है? अगर ये हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है और जिसके कारण समाज में इतनी विषमता व छुआछूत है तो यह परम् सत्य कैसे हुआ? यह असत्य है। यदि यह असत्य है तो मुझे सत्य की खोज करनी पड़ेगी और समाज को बताना भी पड़ेगा। अतः उन्होंने इस काम के लिए एक संगठन बनाया और उसका नाम रखा ‘सत्यशोधक समाज’।
समाज के लिए महान कार्य करते हुए 28 नवम्बर 1890 को ज्योतिबा फुले की मृत्यु हो गई और बहस छिड़ी अंतिम संस्कार में चिता को अग्नि देने की रस्म पूरी करने पर। फुले दंपत्ति का कोई बेटा नहीं था इसलिए उन्होंने काशीबाई, जो ब्राह्मण थी, का एक बच्चा गोद ले लिया, यशवंत राव। मगर गोद लिए बच्चे को समाज ने मुखाग्नि नहीं देने दी इसलिए सावित्रीबाई आगे बढ़ीं और चिता को अग्नि दी। एक औरत का अपने पति की चिता को अग्नि देना जहां आज के समय में भी स्वीकृत नहीं किया जाता, उन्होंने उस वक़्त उस रूढ़िवाद को तोड़ दिया और इससे समझा जा सकता है कि वो उस वक़्त पर कितनी प्रगतिशील थीं।
1897. महाराष्ट्र और पुणे के बहुत से इलाकों में महामारी (प्लेग) फैल गई। अंग्रेज़ लोग उन सभी को जिनके प्लेग होता, उन्हें उनके पूरे परिवार सहित मारते हुए प्लेग के शिकार लोगों के कैंप में छोड़ देते। इन हालातों को देखते हुए सावित्रीबाई और उनके बेटे यशवंत राव ने एक अस्पताल खोल दिया और पीड़ितों का इलाज करने लगे। लोगों को प्लेग से बचाते-बचाते सावित्रीबाई को भी प्लेग ने अपना शिकार बना लिया और 10 मार्च 1897 को समाज की सेवा करते हुए ही उन्होंने ये दुनिया छोड़ दी।
उन्होंने समाज में चेतना के लिए कई कविताएं भी लिखीं जिनमें वो आज भी लोगों को जागरूक करते हुए और अपने विचारों को बताते हुए जिंदा हैं।
आज उनके जन्मदिवस पर ‘द कच्चा चिट्ठा’ टीम उनको याद करती है और जैसे उन्होंने अपने समय की अहमियत समझ कर, उसे इतिहास में बदल दिया वैसे ही उनका एक बालगीत (मराठी भाषा में लिखा गया) वक़्त के महत्त्व को समझ कर, उसे भी एक अच्छे इतिहास में बदलने की प्रेरणा देता है जो इस तरह है –
काम जो आज करना है,
उसे करें तत्काल।
दोपहर में जो कार्य करना है,
उसे अभी कर लो।
पल भर के बाद का सारा कार्य,
इसी पल कर लो।
काम पूरा हुआ या नहीं,
न पूछे मौत आने से पूर्व कभी।