नागरिकता संशोधन बिल के आते ही भारत के पूर्वोत्तर राज्य में इसका विरोध होना शुरू हो गया है और खास कर कि असम में। नागरिकता संशोधन बिल (Citizenship Amendment Bill) को कैब कह कर भी संबोधित किया जा रहा है। इन प्रदर्शनों के दौरान लोग ‘आरएसएस गो बैक’ के नारे लगा रहे हैं और नेताओं और मंत्रियों के पुतले फूँक रहे हैं।

तमाम तरह के बुद्धिजीवी, कलाकार और लेखक इस बिल को लेकर अपना विरोध दर्ज करवा रहे हैं। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्यों ने बिल के सदन में पेश होने के बाद, पहले मशाल जुलूस निकाल कर इसका विरोध किया। अब ये लोग सड़कों पर उतर कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल समेत भाजपा सरकार के कई नेताओं और मंत्रियों के पुतले फूंक कर अपना विरोध दर्ज करवा रहे हैं।

असम के डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, धेमाजी, शिवसागर और जोरहाट ज़िले में भी इस बिल का भारी विरोध किया गया। प्रदर्शनकारियों ने एनएच (नेशनल हाइवे) को भी जाम किया और साथ ही में रेल की आवाजाही को भी ठप करने की कोशिश की है। खबर ये भी है कि कुछ इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी हुआ है।

असम में भारी संख्या में लोग CAG का विरोध कर रहे हैं, फोटो सोर्स: गूगल

असम में भारी संख्या में लोग CAG का विरोध कर रहे हैं, फोटो सोर्स: गूगल

 असम के लोग क्यों कर रहे हैं विरोध?

सवाल ये है कि इस बिल का असम में इतना ज्यादा विरोध क्यों हो रहा है। दरअसल असम के मूल निवासियों को इस बात का डर है कि इस बिल के लागू हो जाने से उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। इन लोगों का सीधा कहना है कि भाजपा इस बिल के जरिये अपना हिन्दू वोट बैंक मजबूत करने की फिराक में है। आपको ये बात बता दें कि एनआरसी से जिन 19 लाख लोगों को बाहर किया गया है उसमें 12 लाख लोग हिन्दू हैं और ये सभी के सभी बंगाली हिन्दू हैं।

बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी इस मुद्दे पर कहते हैं कि इस बिल के लागू होने से अपने ही प्रदेश में असमिया लोग भाषाई अल्पसंख्यक हो जाएंगे। उनका कहना है कि असम में सालों पहले आकर बसे बंगाली बोलने वाले मुसलमान पहले अपनी भाषा बंगाली ही लिखते थे लेकिन, असम में बसने के बाद उन लोगों ने असमिया भाषा को अपनी भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया।

वो आगे कहते हैं:

“राज्य में असमिया भाषा बोलने वाले 48 फ़ीसदी लोग हैं और अगर बंगाली बोलने वाले मुसलमान असमिया भाषा छोड़ देते हैं तो यह 35 फ़ीसदी ही बचेंगे। जबकि असम में बंगाली भाषा 28 फ़ीसदी है और कैब लागू होने से ये 40 फ़ीसदी तक पहुंच जाएगी। फ़िलहाल असमिया यहां एकमात्र बहुसंख्यक भाषा है। वो दर्जा कैब के लागू होने से बंगाली लोगों के पास चला जाएगा।”

इसके अलावा लोगों की चिंता ये भी है कि कैब के लागू होने से असम में धार्मिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण ज़्यादा होगा जिसकी वजह से स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर कम ध्यान दिया जाएगा। भाजपा और आरएसएस के लोग हिंदू के नाम पर सभी लोगों को एक टोकरी में लाने के लिए शुरू से काम कर रहे हैं और काफ़ी हद तक यहां सफल भी हुए हैं।

इस बिल का देश भर में विरोध हो रहा है. केवल और केवल भाजपा और उसके समर्थक ही इस बिल के समर्थन में हैं. ताकि हिंदू वोट बैंक की राजनीति की जा सके। सांप्रदायिकता जितनी बढ़ेगी बीजेपी को फायदा होगा ये बात जग जाहिर है। क्या एक धर्मनिरपेक्ष देश मे धर्म के आधार पर ही नागरिकता दी जा सकती है ? भारत की नागरिकता को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की जा रही है जिसकी वकालत कभी सावरकर ने की थी लेकिन, भारत के संविधान ने उसे सिरे से खारिज कर दिया था।