आज से ठीक 51 साल पहले, 16 अक्टूबर, 1968 को हरगोविंद खुराना नाम के एक साइंटिस्ट को नोबेल पुरस्कार दिया गया था. नाम पढ़ कर शायद आप को लग रहा हो कि ये नोबेल विजेता भारतीय थे.

आप का अंदाज़ा एक हद तक सही भी है.

हरगोविंद खुराना ने अपनी रिसर्च भारत में नहीं की लेकिन, उनका जन्म भारत में जरूर हुआ था. मास्टर डिग्री की पढाई-लिखाई करने के बाद हरगोविंद सही मौक़ा पाकर अमेरिका चले गए थे. वहां पीएचडी की, रिसर्च की और नोबेल पाया. भारत में नौकरी न पाने वाले हरगोविंद अमेरिका में नोबेल पा गए.

हरगोविंद पहले ऐसे नोबेल विजेता नहीं हैं जिनका जन्म भारत में हुआ हो लेकिन, बाद में उन्हें विदेश जाकर काम करना पड़ा हो. 1983 में फिजिक्स के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम चंद्रशेखर ने अमेरिका जाकर नोबेल पाया था. 2009 में केमिस्ट्री के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन ने नोबेल जीता था और हाल ही में इकोनॉमिस्ट अभिजीत बनर्जी को नोबेल मिला है; जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा तो भारत में ही बिताया लेकिन, बाद में वे अमेरिका जाकर बस गए.

इन सब नामों में यही समानता है. जन्मभूमि भारत है, लेकिन कर्मभूमि विदेश. ऐसा क्यों?

सब फसादों की जड़ – फंडिंग

कोई भी प्रोजेक्ट या रिसर्च पूरा होने में उतना ही वक़्त और पैसा लगता है, जितना बड़ा वो खुद होता है. वक़्त तो रिसर्चर का खुद का होता है लेकिन, फंडिंग के लिए उसे सरकार पर निर्भर होना पड़ता है.

भारत अपनी जीडीपी का 0.6 से 0.7 प्रतिशत रिसर्च पर खर्च करता है. इसके विपरीत अमेरिका 2.8 प्रतिशत, चीन 2.1 प्रतिशत और इजराइल 4.3 प्रतिशत खर्च करता है.

आमतौर पर वैज्ञानिक या इतिहासकार ही रिसर्च के लिए फ़ेलोशिप पर निर्भर रहते हैं. जबकि डॉक्टर्स या इंजीनियर्स सैलरी लेकर अपना काम करते हैं. क्योंकि अमेरिका जैसे देशों में करेंसी रेट ज़्यादा है, इसलिए उन्हें Third World के देशों की बजाय विकसित देशों में सैलरी लेने में ज़्यादा फायदा होता है.

माने- इंजीनियर्स से लेकर इतिहासकार, सब बाहर.

संवादहीनता (Communication Gap)

इस बात में कोई दोराय नहीं कि विचारों, धर्मों और भाषाओं की बहुलता किसी भी समाज के लिए अच्छी होती है. लेकिन, कई बार ये बहुलता दिक्क्तें भी पैदा कर देती है.

इसी समस्या पर रिसर्चकर्ताओं की वेबसाइट researchgate.net पर एक चर्चा हुई. नानयांग टेक्निकल यूनिवर्सिटी से संतोष दुबे उस चर्चा में लिखते हैं कि भारत या चीन जैसे देशों में Communication Gap की भी एक दिक्क्त है. यहां कई स्थानीय भाषाएं हैं. जबकि, यूरोपीय देशों में एक ही भाषा होती है. भारत में तो स्कूलों में इंग्लिश सिखा भी दी जाती है. लेकिन, चीन जैसे देश में, जहां अधिकतर लोग केवल मैंडरिन भाषा ही बोलते हैं, Communication Gap एक बड़ी दिक्क्त होती है.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक बैठकों में अक्सर ट्रांसलेटर्स का इस्तेमाल करना पड़ता है (फोटो सोर्स- गूगल)
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक बैठकों में अक्सर ट्रांसलेटर्स का इस्तेमाल करना पड़ता है (फोटो सोर्स- गूगल)

पॉवर पॉलिटिक्स

बाहरी लोगों को यह लग सकता है कि रिसर्च के काम में केवल मोटे-मोटे चश्में लगाए कुछ लोग शामिल होते हैं. जबकि, असलियत ये है कि कोई भी रिसर्च संस्था वहां की सरकार और पॉलिटिक्स से सीधे संपर्क में होती है. यह बात पूरा भारत जानता है कि हाल ही में नोबेल जीते इकोनॉमिस्ट अभिजीत बनर्जी नोटबंदी के कड़े आलोचक रहे हैं और उनकी इस आलोचना की वजह से वह तत्कालीन सरकार की Good Books में शामिल भी नहीं हैं. अगर अभिजीत बनर्जी अमेरिका की जगह भारत में होते, तो जाहिर सी बात है कि उन्हें सरकारी मशीनरी से किसी तरह की सहायता नहीं मिलती और इकोनॉमिस्टस अकेले ऐसे लोग नहीं हैं जो सरकार के चपेटे में आते हैं.

  • साल 1994 में इसरो के साइंटिस्ट नम्बी नारायण पर जासूसी का केस चला. बाद में पता चला कि वो केस ऊपर बैठे कुछ लोगों की शैतानी थी.
  • UPA की सरकार के दौरान बीसीयों इतिहासकार प्रधानमंत्री तक को पत्र लिखते रहे ताकि nehru memorial museum and library के हो रहे पतन को रोका जा सके. लेकिन, उन पत्रों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई क्योंकि, उन्हीं इतिहासकारों ने अपनी किताबों में कांग्रेस की आलोचना की थी.
पॉलिटिक्स से परेशान विश्व-विख्यात इकोनॉमिस्ट रघुराम राजन ने 2016 में RBI छोड़ दिया था (फोटो सोर्स- गूगल)
पॉलिटिक्स से परेशान विश्व-विख्यात इकोनॉमिस्ट रघुराम राजन ने 2016 में RBI छोड़ दिया था (फोटो सोर्स- गूगल)

यूरोपियन देशों में वैज्ञानिकों या अन्य बुद्धिजीवियों को इस तरह की दिक्क्तें कम झेलनी पड़ती हैं क्योंकि, वहां की जनता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of speech) की आदि हो चुकी है और सरकार इतनी आसानी से रिसर्च कार्यों में दखल नहीं दे सकती।

कम विकसित देशों से हो रहे इस Brain drain को रोकने के लिए अलग-अलग सरकारें बेहतर यूनिवर्सिटीज, इंफ्रास्ट्रक्चर और फ़ेलोशिप के वादे करती रहती हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब यूरोपीय देशों ने वीज़ा देने के कानून ढीले किये हैं, तब-तब पढ़े-लिखे लोगों के एक बड़े तबके में ख़ुशी की लहर दौड़ी है.


यह भी पढ़ें: अर्थशास्त्र का नोबेल पाने वाले अभिजीत को जब 10 दिन के लिए जेल जाना पड़ा था