‘अपनी भाषा में फील है’

मशहूर आईएएस(IAS) कोच समीर सिद्दीकी की माँ ने एक दिन उनसे एक सवाल किया कि दुनिया का सबसे अमीर इंसान कौन है? उन्होंने अमूमन आम लोगो की तरह ही बिल गेट्स का नाम बता दिया। लेकिन उनकी माँ ने उन्हें गलत ठहराते हुए बताया कि ‘दुनिया का सबसे अमीर इंसान वो है जिसे सबसे ज़्यादा ज़ुबानें आती है’, मतलब कि सबसे ज़्यादा भाषाएँ।

इस बात का ज़िक्र यहां इसलिए करना ज़रूरी महसूस हुआ क्योंकि देश के दक्षिणी राज्यों में एक भाषा का विरोध हो रहा है। वो भी इसलिए क्योंकि शायद वहाँ के लोगों को लगता है कि ये उनकी संस्कृति पर हमला है और उनकी स्थानीय भाषा को दबाने के लिए किसी दूसरी भाषा को तानाशाही कानून के ज़रिए उन पर थोपा जा रहा है। इसलिए कुछ दिनों से दक्षिणी राज्यों में हंगामा बरपा हुआ है। चलिए जानते है क्या है इस हंगामे की वजह और इतिहास?

हंगामा क्यों मचा है?

असल में बीते शुक्रवार को मशहूर वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन के अगुवाई वाली कमेटी ने नई शिक्षा प्रणाली का ड्राफ्ट मोदी सरकार की कैबिनेट को सौंपा। इस नई शिक्षा प्रणाली के मसौदे में स्कूली शिक्षा के अंदर, तीन भाषा के फ़ॉर्मूले की बात कही गई है। अब शिक्षा लेना तो सबका संवैधानिक हक़ भी है और ज़रूरी भी। तो फिर बवाल क्यों खड़ा हो गया इस फ़ॉर्मूले पर? दाल में कुछ तो काला होगा।

तो जनाब इस फ़ॉर्मूले पर बवाल इसलिए मच गया है क्योंकि इसमें हिन्दी भाषी राज्यों और गैर-हिन्दी भाषी राज्यों के लिए अलग-अलग बात कही गई है। इस ड्राफ्ट में कहा गया है कि,

हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी-अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य क्षेत्र की भाषा की शिक्षा दी जाए। वहीं, गैर-हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा क्षेत्रीय भाषा की शिक्षा दी जाए

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के कस्तूरीरंगन/ फोटो सोर्स- गूगल

ड्राफ्ट में साफ-साफ लिखा है कि गैर-हिन्दी भाषी प्रदेशों(मतलब दक्षिणी राज्य) में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अलावा क्षेत्रिए भाषा की शिक्षा दी जाए। मतलब जहां हिन्दी का नामो-निशां नहीं वहां उसे अनिवार्य के तौर पर पढ़ाया जाए और जो क्षेत्रिए भाषाएँ उनकी ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा है उसे तीसरी भाषा के तौर पर पढ़ाया जाए।

अब बताइए ऐसा प्रस्ताव देंगे तो बवाल तो मचेगा ही न। अख्खा इंडिया जनता है कि गैर-हिन्दी भाषी राज्य यानि कि दक्षिणी राज्य, उत्तरी राज्यों की तरह नहीं है, जो अपनी संस्कृति और भाषा को भूल जाए या उसे अपना कहने में भी शर्म आए। बल्कि, दक्षिणी राज्य तो अपने रीति रिवाज़ और लोकल भाषा को बहुत अहमियत देते हैं, चाहे वो देश या दुनिया के किसी भी कोने में रहे| जब तक किसी दूसरी भाषा की अवश्यकता न पड़ जाए; वह अपनी क्षेत्रीय भाषा में बात-चीत करते हैं। चाहे आप किसी भी राज्य के किसी भी अस्पताल या दफ्तर या कहीं भी चले जाएं क्योंकि दक्षिण के लोग अच्छे से इस बात को जानते है कि ‘अपनी भाषा में फील है’।

लेकिन फिर भी एक भाषा को सीखने का विरोध कुछ अटपटा सा लगता है। खैर, इस ड्राफ्ट पर दक्षिण के बहुत से नेताओं ने अपना कड़ा विरोध दर्ज करवाया है। जिसमे भाषा की ही राजनीति कर देश की राजनीति में आई DMK पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष एमके स्टालिन ने बहुत तीखे लफ्जों में सरकार को चेतावनी दी है कि,

‘तमिलनाडू पर हिन्दी भाषा को थोपने का मतलब है कि मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मारना’

स्टालिन ने आगे कहा कि अगर बीजेपी की सरकार दक्षिण के राज्यों पर हिन्दी थोपने की कोशिश करेगी तो वह उनके खिलाफ जंग का ऐलान कर देंगे। वहीं, इसी पार्टी की लोकसभा सांसद कनिमोझी ने कहा कि, ‘मैं बीजेपी को चेतावनी देती हूं कि यह कदम उसके लिए बर्बादी का कारण बनेगा’

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एमके स्टालिन/ फोटो सोर्स- गूगल

साथ ही, तमिलनाडू की ही दूसरी प्रमुख पार्टी AIADMK  ने भी अपना विरोध जताया है। तमिलनाडु सरकार में मंत्री केटी राजेंद्र बालाजी ने कहा था, “AIADMK टू-लैंग्वेज पॉलिसी में भरोसा करती है और पार्टी थ्री-लैग्वेंज पॉलिसी का विरोध करेगी।”

बीतते वक़्त के साथ इस विरोध की लिस्ट बढ़ती जा रही है जिसमें दक्षिण की लगभग सारी पार्टियां इसके विरोध में खड़ी हो गई है। जिसमें कर्नाटक के सीएम एचडी कुमारस्वामी से लेकर कई हिन्दी फिल्मों में काम कर चुके कमल हसन भी शामिल हो चुके है। काँग्रेस नेता पी. चिदम्बरम और शशि थरूर ने भी इस पर अपना विरोध जताया है। लेकिन तमाम नेताओं और पार्टियों के साथ इस विरोध सूची में अब महाराष्ट्र की राज ठाकरे की अध्यक्षता वाली पार्टी एमएनएस भी शामिल हो गई है। एमएनएस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर एमएनएस नेता अनिल शिदोरे का बयान ट्वीट किया गया है। ये बयान मराठी में है जिसमें कहा गया है कि,

“हिंदी एक राष्ट्रीय भाषा नहीं है, इसे हमारे माथे पर मत थोपो”

ट्वीट देख लीजिए:

अच्छा ये तो रही विरोध की बात। अब आप ज़रा मोदी सरकार और इस ड्राफ्ट के बचाव में उतरे नेताओं का बयान भी जान लीजिए। बढ़ता विरोध देख कर रविवार को दो बड़े केंद्रीय मंत्री सामने आए। जिसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस जयशंकर हैं।

दिलचस्प ये है कि मोदी सरकार के ये दोनों ही मंत्री तमिलनाडु से हैं। इन्होंने कहा कि किसी भी राज्य पर हिंदी थोपी नहीं जाएगी। नए नवेले विदेश मंत्री बने जयशंकर ने ट्वीट किया कि,

‘‘नेशनल एजुकेशन पॉलिसी ने मानव संसाधन मंत्रालय को केवल अपना ड्राफ्ट पेश किया है। सामान्य जनता से इस बारे में फीडबैक लिया जाएगा। प्रदेश सरकारों से बातचीत की जाएगी। इसके बाद ड्राफ्ट फाइनल किया जाएगा। केंद्र सरकार सभी भाषाओं का सम्मान करती है। कोई भी भाषा थोपी नहीं जाएगी’’

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पिछली मोदी सरकार में एचआरडी मंत्री रहे प्रकाश जावड़ेकर ने इस विरोध पर कहा कि,

“समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। ड्राफ्ट तैयार किया जा चुका है लेकिन सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया है। ड्राफ्ट पर प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही हम कोई फैसला लेंगे”

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उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू/ फोटो सोर्स- गूगल

इस नई शिक्षा नीति के विरोध का जवाब देने खुद देश के उप-राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू मैदान में आ गए। उन्होंने लोगों से कहा कि

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे का विरोध करने वाले लोगों को अंतिम नतीजे पर पहुंचने से पहले उसका गंभीरता से अध्ययन, बहस और विश्लेषण करना चाहिए। ताकि सरकार उस पर चर्चा कराने के बाद आगे की कार्रवाई कर सके’

वहीं विरोध करने वालों पर तंज़ कसते हुए उन्होंने कहा कि’

‘हमारे देश में कुछ लोगों की आदत है कि राजनीतिक या अन्य कारणों से वो अखबारों की हेडलाइन देखते ही विरोध शुरू कर देते हैं’

ध्यान देने वाली बात ये है कि सबसे ज़्यादा विरोध तमिलनाडू में हो रहा है। लेकिन क्यों? इसको समझने के लिए थोड़ा सा इतिहास खंगालना पड़ेगा।

तमिलनाडू में हिन्दी के विरोध का इतिहास?

असल में इस तरीके का विरोध कोई नया नहीं है। दक्षिणी राज्यों में जब भी हिन्दी ने अपने पैर पसारने की कोशिश की है। उसका विरोध हुआ है। लेकिन इतिहास बताता है कि यह विरोध देश की आज़ादी से भी पहले से चल रहा है। असल में तमिलनाडु की राजनीति में हिन्दी का विरोध साल 1937 से जारी है। साल 1953 में डीएमके के संस्थापक अन्नादुराई ने हिन्दी नामों को साइन बोर्ड से हटाने का आंदोलन शुरू किया। जिसमें वो काफी हद तक कामयाब रहे। वहीं, उस वक़्त डीएमके के प्रमुख रहे डी. एम. करुणानिधि भी इस आंदोलन में शामिल रहे। जो आगे चलकर कई बार तमिलनाडू के मुख्यमंत्री भी बने।

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डी. एम. करुणानिधि/ फोटो सोर्स- गूगल

अब आया 60 का दशक। साल 1963 में आधिकारिक भाषा अधिनियम के पारित होने के साथ ही हिन्दी आंदोलन ने फिर से काफी तूल पकड़ लिया। 60 के दशक के इस आंदोलन को डीएमके चला रही थी। यह हिन्दी विरोधी आंदोलन इतना सफल हुआ कि इसने छात्र आंदोलन का रूप ले लिया। इसलिए ज़्यादातर राजनीतिक पंडित और मौलवी बताते हैं कि तमिलनाडू में डीएमके को हिन्दी का विरोध करना ही टॉनिक देता रहा।

तमिलनाडू की शिक्षा व्यवस्था और नई शिक्षा प्रणाली में अंतर समझ लीजिए?

असल में डीएमके प्रमुख स्टेलिन के अनुसार ये नई शिक्षा प्रणाली अगर स्कूलो मे लागू हुई तो देश का विभाजन कर देगी। अजी हाँ, इतना आसान है क्या देश का विभाजन हो जाना। खैर, ये विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि साल 1968 से तमिलनाडू राज्य में केवल दो भाषाओं के फॉर्मूले पर शिक्षा नीति चल रही है। तमिलनाडु में केवल तमिल और अंग्रेजी पढ़ाई जाती है।

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तमिलनाडू के स्कूल में पढ़ते बच्चे/ फोटो सोर्स- गूगल

वहीं वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन द्वारा बनाये गए शिक्षा के इस नये मसौदे में कहा गया है कि 2-8 वर्ष की आयु के बच्चे भाषाएं जल्द सीखते हैं। बहुभाषी फॉर्मूला बच्चों के लिए काफी फायदेमंद हैं। इसलिए बच्चों को शुरुआती चरण से ही तीन भाषाओं की शिक्षा दी जाए। जो बच्चे अपनी कोई एक भाषा बदलना चाहते हैं, वह ऐसा छठवीं कक्षा में कर सकते हैं। इसलिए पूरे देश में तीन भाषा का फॉर्मूला लागू होना चाहिए।

अब इस पर तो तमिलनाडू समेत दक्षिण के लोगों और सरकारों को मिलकर फैसला लेना चाहिए कि उनके लिए और देश के हित में कौन-सी शिक्षा नीति बेहतर होगी। लेकिन इस पर दक्षिण के लोगों को भाषा या किसी भी चीज़ पर राजनीति का शिकार होने से भी बचना चाहिए। वहीं दूसरी ओर मोदी सरकार को भी कोई क़ानून किसी राज्य पर चाहे वो दक्षिण के राज्य हो या कोई भी राज्य, किसी भी तरह का फैसला थोपने की नियत से न बनाना चाहिए और न ही लागू करना चाहिए। हमारे प्यारे हिंदुस्तान में सभी को अपने फैसले लेने और खुलकर जीने का हक़ है। इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले देश के संविधान को ज़रूर याद रखें चाहे वह वर्तमान मोदी सरकार हो या आने वाली कोई भी सरकार हो।

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