“देश का ही नहीं, नक्सल का भी इतिहास लिखा जा रहा हैं”

आज हम एक साहसी नक्सली औरत के बारे मे बात करेंगे। आप सोच रहे होंगे कि कोई नक्सली होकर साहसी काम कैसे कर सकता है? तो जनाब यही तो मुद्दे की बात है और फिर कहते है न कि ‘सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते’

इस नक्सली महिला ने इतिहास लिख दिया है।

नक्सली सुनीता उर्फ हुंगी कट्टम। ये उस महिला का नाम है जिसने नक्सल के भयावह इतिहास को बदल दिया है। वो ऐसे कि इस महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया है। अब भला बच्ची को जन्म देने से इतिहास कैसे लिखा जा सकता है। एक नक्सली का बच्ची को जन्म देना इतिहास इसलिए बन गया है क्योंकि, महिला नक्सलियों में इससे पहले कोई भी महिला माँ नहीं बनी, न किसी बच्चे को जन्म दे पाई। वो इसलिए क्योंकि नक्सलियों के नियम अनुसार ‘कोई भी महिला बच्चे को जन्म नहीं दे सकती है, इसी शर्त पर उनकी शादी कराई जाती है’ अब जब शर्त यही है कि बच्चे को जन्म नहीं देना है। तो आखिर कैसे इस महिला ने ये साहसी काम कर दिखाया?

सुनीता के इस इतिहास को रचने का सफर कठिनाइयों से भरा था। एक तो ये महिला नक्सल, जिसे आए दिन किसी न किसी मुठभेड़ में अपनी यूनिट के साथ शामिल होना पड़ता। सुनीता के नाम के आगे ये ‘नक्सल’ शब्द साल 2014 में जुड़ गया। जब सुनीता सुकमा के बासागुड़ा एलओएस में भर्ती हुई। नक्सल बनने के सफर में उसे अप्रैल 2015 में दक्षिण बस्तर डिवीजन से 20 साथियों के साथ उत्तर बस्तर कांकेर डिवीजन भेजा गया। यहां वह कुएमारी एलओएस में काम करने लगी।

सुनीता सरेंडर करते हुए, फोटो सोर्स: गूगल

सुनीता मार्च 2018 में ताड़ोकी के मसपुर में हुए हमले में शामिल थी, जिसमें बीएसएफ के दो जवान, एक अस्सिटेंट कमांडेंट और एक आरक्षक शहीद हो गए थे। साथ ही, इस महिला नक्सल पर एक लाख का सरकारी इनाम भी है।

पर फिलहाल सुनीता ने खुद को सरेंडर कर दिया है। सुनीता उर्फ हुंगी कट्टम ने नक्सलवाद को 15 मई को अलविदा करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया है।

साल 2018 में किसकोड़ो एरिया कमेटी के प्लाटून नंबर 7 के सदस्य मुन्ना मंडावी से उसकी मुलाकात हुई। ये मुलाक़ात आगे बढ़ी तो दोनों ने संगठन में रहते हुए ‘बच्चे न पैदा करने की नक्सली शर्त’ के साथ शादी कर ली। लेकिन सुनीता गर्भवती हो गई। यह जानकारी साथी नक्सलियों को भी पता चल गई तो, उन्होंने शर्त का पालन करने का दवाब बनाया और बस यही से शुरू हुआ सुनीता का अपनी बच्ची को जन्म देने का कठिन सफर। कठिन इसलिए क्योंकि जिन साथियों के साथ सुनीता हमेशा कदम से कदम मिला कर चलती रही। उन्होंने ही सुनीता पर तरह-तरह के ज़ुल्म करने शुरू कर दिए। वो कहते है न ‘ज़ुर्म की दुनिया में कोई किसी का सगा नहीं होता’ और ये तो फिर भी माओवादियों की दुनिया थी।

सुनीता को पहले के मुक़ाबले कम खाना दिया जाने लगा। गर्भवती की अवस्था में भी जान बूझकर उसे पहाड़ों पर बार-बार चढ़ाया गया। जंगलों मे दूर-दूर तक पैदल चलवाया गया। ये सभी तकलीफ़े उसे इसलिए दी जा रही थी ताकि, किसी भी तरह उसका गर्भपात हो जाए। लेकिन, सुनीता ने अपनी कोख में पल रहे बच्चे के प्रति हार नहीं मानी। उसने हर तरह के ज़ुल्म को सह लिया। इसकी मेहनत रंग लाई और 2 मई को आखिरकार सुनीता ने नक्सली उसूलों पर जोरदार तमाचा जड़ दिया। सुनीता अब माँ बन चुकी थी। लेकिन सुनीता का दिल उस वक़्त टूट गया जब इस दर्दनाक शिद्दत में उसके पति और साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। वो सब उसे तड़पते हुए जंगल में अकेला छोड़ गए।

सरेंडर के दौरान सुनीता ने मीडिया से बातचीत में बताया कि –

“जब उनके सभी प्रयास असफल हो गए तो मुझे कोयलीबेड़ा के चिलपरस गांव के बाहर जंगल में तड़पता हुआ छोड़ भाग गए। मैंने 2 मई को बच्ची को जंगल में जन्म दिया। मेरे पास कोई नहीं था”

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सुनीता की बच्ची, फोटो सोर्स: गूगल

फ़िलहाल बच्ची काफी कमज़ोर है और डॉक्टरों की निगरानी में है। 15 दिन की बच्ची का वज़न सिर्फ 1.83 किलो है। पुलिस को 10 दिन बाद ये सूचना मिली कि एक नक्सली महिला ने बच्ची को कोयलीबेड़ा के गांव चिलपरस में किसी बच्ची को जन्म दिया है।

इस पूरी घटना पर एसपी केएल ध्रुव ने बताया कि,

“12 मई को सूचना मिली कि कोयलीबेड़ा के गांव चिलपरस में एक महिला नक्सली नवजात शिशु के साथ है। पुलिस ने गांव की घेराबंदी कर उसे खोज निकाला। नवजात काफी कमजोर था। महिला की स्थिति भी ठीक नहीं थी। बच्चा दूध भी नहीं पी पा रहा था। जिसे देख गश्ती टीम तत्काल महिला और नवजात को इलाज के लिए कोयलीबेड़ा लेकर पहुंची। महिला को यहां से अंतागढ़ फिर वहां से कांकेर रेफर किया गया। जिला अस्पताल के आईसीयू में नवजात का इलाज चल रहा है”

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सुनीता अपनी बच्ची के साथ, फोटो सोर्स: गूगल

ध्रुव आगे कहते है कि,

“नक्सलियों ने रात में चिलपरस गांव के बाहर सुनीता को तड़पता छोड़ दिया था। पानीडोबीर एलओएस कमांडर मीना नेताम के कहने पर सुनीता को छोड़ा गया। मीना ने सुनीता को संगठन में रखने से मना कर दिया था। जिसके बाद वह गांव के एक घर में पनाह लेकर रह रही थी। घटना के बाद सुनीता ने नक्सलवाद से मुंह मोड़ लिया। इस बीच सरेंडर कर चुके पूर्व नक्सलियों ने उसे पुनर्वास योजना की जानकारी दी, जिसके बाद महिला 15 मई को एसपी ऑफिस आई और आत्मसमर्पण किया। योजना के तहत उसे तत्काल 10 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि दी गई है।”

सरकार नक्सलियों को सही रास्ते पर लाने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही है। जिसके तहत अगर कोई नक्सली अपराध की दुनिया छोड़ कर आत्मसमर्पण करता है तो, उसे कई तरह की सरकारी सुविधाएं और प्रोत्साहन राशि दी जाती है। ताकि वह व्यक्ति वापस से समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके।