देश बदल रहा है जिसका सबूत हमारे भावी नेता ही दे रहें हैं। चुनाव के पहले ये महान नेता यही तो साबित करना चाहते है और दिखाना भी कि हमने देश को क्या दिया? यह बात वो बखुबी साबित कर रहे हैं। तभी तो देश के विकास के बारे में न सोचते हुए अपने विपक्षी नेताओं के जाति के उपर सवाल उठाए जा रहे हैं। अब तो यह बताते हुए कोई हैरानी नहीं हो रही है कि हमारे नेता जाति और DNA के प्रोपेगेंडा में फंसे हुए हैं। क्योंकि अगर यह मामला पहली बार होता तो शायद हैरानी होती लेकिन राजनीति की दुकान को चलाने वाले ये दुकानदार अपनी दुकान चलाने के लिए कुछ भी कह सकते है। हाल ही में अनंत हेगड़े द्वारा दिए गए बयान के बाद सियासी सैलाब एक बार फिर से टूट पड़ी है।

क्या है मामला

केन्द्रिय मंत्री और बीजेपी नेता अनंत हेगड़े ने जिस तरह से राहुल गांधी को लेकर बयानबाजी की है उससे एक बात साफ तौर पर सामने आया है कि ये सत्ता के पुजारी वोट के लिए किसी भी स्तर पर जाने के लिए तैयार हो सकते है। अनंत हेगड़े ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा था,

यह मुस्लिम जो खुद को जनेउधारी हिन्दू बताते हैं, क्या उनके पास एक भी सबूत है कि वह हिन्दू है?

हेगड़े यही नहीं रुके उन्होने इस बात में और भी कुछ जोड़ते हुए कहा-

‘राहुल इस देश को नहीं जानते और ना ही उनको अपने देश के बारे में कुछ पता है। राहुल के पिता मुस्लिम थे और मां ईसाई तो यह कैसे संभव है कि वह हिन्दू है’।

हेगड़े के इस बयान के बाद सियासी माहौल तो गरम हुआ ही है लेकिन इस माहौल ने कई प्रश्नों को सामने लाकर भी खड़ा कर दिया है।

क्या राजनेता को अगर जनता के सामने आना है तो जातिय समीकरण को अपनाना ज़रुरी है?

अगर कोई भी राजनेता वोट बैंक के लिए सबसे आसान तरीका अपनाने के लिए सोचे तो वह जाति को सबसे पहले तवज्जों दे? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि आखिर भारतीय राजनीति के इतिहास पर गौर करें तो जाति को लेकर सबसे ज्यादा बयानबाजी 2014 के बाद ही हुए है, इसके कारणों पर गौर करने की ज़रुरत है। हेगड़े से पहले भी इस तरह के कई बयान दिए जा चुके हैं और अगर गौर करें तो जाति का चोला पहने बीजेपी इस मामले में भी काफी आगे है।

डीएनए से एनडीए तक..

21 अगस्त 2015, बिहार की राजनीति ने कई दफा अपनी तस्वीर को बदलते देखा है। जब बिहार की राजनीति का कमान प्रधानमंत्री मोदी को दिया गया तो उन्होंने जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार के अलगाव को प्रमुख मुद्दा बनाया और फिर शुरु हुई ‘जातियों की रामलीला’। मोदी ने कहा था,

‘जीतन राम मांझी पर जुल्म हुआ तो मै बेचैन हो गया था। एक चाय वाले की थाली खिंच ली गई थी तो चलो कोई बात नहीं लेकिन एक महादलित के बेटे का सबकुछ छिन लिया तब मुझे शायद ये लगा कि डीएनए में ही कुछ गड़बड़ी है’।  

मोदी के इस बयान के बाद तो जैसे जातियों का एक शब्दकोश तैयार किया गया जिसमें से एक-एक कर समय-समय पर शब्द बाणों की बारिस की जाने लगी। नीतीश कुमार ने जहां इस बात को बिहार के गौरव से जोड़कर देखा तो वहीं जनता दल (यूनाइटेड) के आह्वान पर बिहार के विभिन्न क्षेत्रों से पार्टी के कार्यकर्ताओं ने डीएनए की जांच के लिए अपने नाख़ून और बाल के नमूने प्रधानमंत्री कार्यालय भेजने शुरू कर दिए। एक महीने के अंदर ही नाख़ून और बाल के कई हज़ार नमूने प्रधानमंत्री कार्यालय पहुँच गए। प्रधानमंत्री मोदी ने जिसके डीएनए के बारे में बात की थी शायद उसका डीएनए एनडीए के लिए सही साबित हुआ और फिर बीजेपी के साथ मिलकर इस समय बिहार में चुनावी डंका बजाने के लिए तैयार हो गए है।

इस बयानबाजी के बाद बीजेपी की जो तस्वीर जनता के सामने आई है उससे तो बस यही समझ आ रहा है कि जातिवाद को राजनीति का हथियार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा गया। अगर देखा जाए तो राम मंदीर का मुद्दा जब पूरी तरह से अपने चरम पर था तो हनुमान को लेकर भी इन नेताओं ने अपने ज्ञान का परिचय बखुबी दिया। इसमें योगी आदित्यनाथ से लेकर बाबा रामदेव तक का नाम शामिल है। अगर किसी की जाति और उसके संस्कार पर सवाल उठाए जाते है तो इससे साफ झलकता है कि उन लोगों का वजुद क्या है जिनको देश के विकास से ज्यादा औरों की DNA की पड़ी है।

कांग्रेस भी पीछे नहीं

इस मामले में कांग्रेस को भी कम आंकना गलत होगा क्योंकि कांग्रेस ने भी पीएम नरेन्द्र मोदी के लिए कहा था,

‘मोदी के डीएनए में हीं बोलना है और अगर वो चुप रहेंगे तो बिमार पड़ जाएंगे’।

सवाल तो ये भी उठाए जा रहे है कि कहीं जातिवाद के रथ पर सवार बीजेपी के पीछे आरएसएस का हाथ तो नहीं? खैर, इस जातिवाद और DNA के खेल में राजनीतिक पार्टियां कहां तक सफल होती है। इसका नज़ारा 23 मई को देखने को मिलेगा।

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