लोकसभा चुनाव आने वाला है। एक बार फिर मतदाताओं को इस बात की उम्मीद होगी कि उनके द्वारा चुनाव में चुने गए उम्मीदवार कुछ नई सोच और नए भरोसे को जन्म देंगे। कोई भी मतदाता यह बिल्कुल नहीं चाहेगा कि वह चुनाव के समय किए गए वादों के बीच एक सपने को लेकर पूरा पांच साल बिता दे। जिस तरह से आज़ादी के बाद से लेकर अब तक आम नागरिकों को ये सत्ता के भूखे नेता गुमराह करते आए है, अब वक्त आ गया है कि आम जनता अपना नेता चुनने से पहले एक बार ज़रुर सोच ले कि क्या उनके द्वारा चुने जाने वाला उम्मीदवार सही है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी प्रभाव को देखते हुए हम एक ऐसे उम्मीदवार को चुनने जा रहे हैं जो हमारी उम्मीद पर खरा न उतर पाए। जिस नेता को हम चुनने जा रहें हैं क्या वो हमारी ज़रुरतों को समझ पा रहा है या कही ऐसा तो नहीं कि वोट बैंकिंग के लिए वह हमारी मूलभूत ज़रुरतों पर ध्यान न देकर कहीं बेमेल मुद्दों की बात कर रहा हो। ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जो हमें वोट देने से पहले एक बार खुद से पूछने की ज़रुरत है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने लोकसभा चुनाव से पहले कुछ मुद्दों को आधार बनाते हुए एक सर्वे किया है जिसमें कई सारे सवाल सामने आए है। इस सर्वेक्षण का केवल एक ही मकसद था कि अगर कोई आम जनता किसी उम्मीदवार को चुनाव के मैदान में जीत दिलाती है तो सिर्फ और सिर्फ इसी उम्मीद से कि वह जीता हुआ प्रत्याशी उनकी ज़रुरतों को ध्यान में रखकर आगे काम करेगा। लेकिन यह वोट बैंकिग का ही तो खेल है जो नेताओं को शायद यह सबसे पहले करने के लिए कहता है कि जिन मासूम जनता ने आपको जीत दिलाकर नेता बनाया पहले उनके भावनाओं और उम्मीदों को कुचल दिया जाए। आइए जानते है एडीआर के इस रिपोर्ट में कौन-सी बातें निकलकर सामने आई है।

क्या है रिपोर्ट?

सर्वेक्षण का ग्राफ, फोटो सोर्स – गूगल

अक्टूबर 2018 से लेकर नवंबर 2018 के बीच हुए इस सर्वे में शासन के 15 महत्वपूर्ण मुद्दों पर उत्तर प्रदेश के मतदाताओं द्वारा किए गए मूल्यांकन का विश्लेषण है। सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के सभी 80 संसदीय क्षेत्रों में आने वाले लगभग 40000 मतदाताओं को शामिल किया गया। जनता की हर मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में सरकार पूरी तरह कामयाब नहीं रही चाहे वो रोजगार हो, बेहतर स्वास्थ व्यवस्था हो या फिर हो कानून व्यवस्था। यही नहीं इस सर्वे में एक और बात सामने आ रही है कृषि, बिजली और प्रदूषण की रोकथाम में भी सरकार कामयाब नहीं रही है। आइए एक-एक कर समझते है कि आखिर लोगों ने कितना उम्मीद किया था और सरकार उन उम्मीदों पर कितना खरा उतर पाई है।

रोजगार

किसी भी सरकार को अगर हम मनोनीत करते है तो उससे इस बात की उम्मीद ज़रुर होती है कि बेरोजगार की समस्या से हमें मुक्ति मिलेगी। लेकिन केवल जुमला साबित होता है या यह कहे रोजगार उपलब्ध कराना आज के समय में राजनीतिक पार्टियों की जीत का एक मात्र मंत्र बन चुका है। अगर बात उत्तर प्रदेश की करें तो चाहे पिछली सरकार हो या फिर योगी सरकार, किसी ने रोजगार के लिए कुछ खास नहीं किया जिसकी उम्मीद जनता को थी। लोगों को योगी सरकार में इस बात की उम्मीद थी कि जिस तरह से योगी जी चुनाव से पहले युवाओं को लेकर चिन्ता दिखा रहे थे तो शायद चुनाव के बाद इसी चिन्ता के साथ रोजगार भी देंगे लेकिन चुनाव के परिणाम के बाद ‘बेरोज़गार को रोजगार देना’ जैसी लाइन केवल नेताओं द्वारा दिए गए भाषण की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित हो गई। क्योंकि हाल ही में आए आकड़े पर नज़र डाले तो समझ में आएगा कि सरकार ने रोजगार के नाम पर क्या किया? आकड़े के अनुसार लोगों के 45% रोजगार को बेहतर करने की उम्मीद पर योगी सरकार केवल 20% ही रोजगार उपलब्ध करा पाई है जो एक सरकार के द्वारा राज्य के युवाओं के लिए किए गए कार्यों को बखूबी बयान करता है।

स्वास्थ्य सेवाएं

फोटो सोर्स – गूगल

स्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जिसमें योगी सरकार हमेशा ही सवालिया निशाने पर रही है चाहे वो गोरखपुर में ऑक्सीज़न की कमी से हुई मासूम बच्चों की मौत हो या फिर स्कूल में मिड डे भोजन के कारण हुए छात्रों की मौत हो। योगी सरकार के लाख प्रयास करने के बावज़ूद जो आकड़ा सामने आया है वह भी सरकार की नाकामी की दास्तान बता रहा है। योगी सरकार से लोगों को उम्मीद थी कि अगर योगी सरकार में आते है तो कम से कम 35% स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो पाएगी लेकिन सरकार केवल 27% ही सेवाएं बेहतर कर पाई है। हॉस्पिटल की उपलब्धता मामले में भी सरकार कुछ खास नहीं कर पाई। लोगों के 37% उम्मीद के जवाब में केवल 26% ही सफल हो पाई है सरकार।

कृषि  

हमेशा से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। वही उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि है। लगभग 65% जनता कृषि पर निर्भर है। लेकिन शायद इस बारे में उत्तर प्रदेश सरकार को खबर नहीं! आज वोट बैंक के लिए कृषकों का जितना इस्तेमाल किया जा रहा है उससे राजनीतिक पार्टियों की मानसिकता समझ में आती है। अगर देश के अर्थव्यवस्था में कमी हो तो वहां नुकसान के लिए किसान सामने दिखाई देते है। जब चुनाव की बारी आती है तो वहां किसानों के अंगूठे खोजे जाते है वोट देने के लिए। लेकिन जब बात विकास और योजनाओं की आती है तो सरकार के शब्दकोश में शायद किसान शब्द ही गायब हो जाता है। योगी सरकार में भी इसी कहानी को एक बार फिर दोहराया गया। आइए एक नज़र डालते है कि कैसे कृषि में योगी सरकार फिसड्डी साबित हुई है।

कृषि ऋण उपलब्धता

योगी आदित्यनाथ के सरकार में आने से पहले लोगों को इस बात की उम्मीद थी कि शायद बीजेपी की सरकार में कृषि ऋण उपलब्ध हो पाएगा जिसकी उन्हें 44% उम्मीद थी लेकिन सरकार की बात करें तो वह इस मामले में 23% ही सफल हो पाई।

कृषि के लिए बिजली

कृषि के लिए बिजली की उपलब्धता के मामले में भी योगी सरकार काफी पिछे नज़र आ रही है। लोगों ने उम्मीद की थी अगर बीजेपी सरकार में आती है तो 44% इस मामले में उन्नति हो पाएगी लेकिन उम्मीद के विपरीत योगी सरकार 21% ही सफल रह पाई।

इस तरह से और भी कई सारे ऐसे मामले है जिनमें योगी सरकार को कुछ खास सफलता नहीं मिल पाई है। लेकिन अगर सरकार को जो पब्लिक चुन कर सत्ता में बैठाती है अगर उस आम जनता के मूलभूत ज़रुरतों को सरकार नहीं पूरा कर पाती है तो क्या इससे किसी तरह का विकास हो पाना संभव है। अगर नहीं, तो फिर इस मामले में सरकार को जागरुक होने का समय आ गया है। और अगर हां तो उस विकास का क्या मतलब जिसमें आम जनता ही चैन और सुकून की ज़िंदगी ना बिता सके।

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